वरुथिनी एकादशी व्रत कथा (Varuthini Ekadashi Vrat Katha In Hindi)


वरुथिनी एकादशी व्रत कथा (Varuthini Ekadashi Vrat Katha In Hindi)

वरुथिनी एकादशी (Varuthini Ekadashi) हिंदू धर्म में एक पवित्र दिन माना जाता है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार यह दिन वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन होता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार आमतौर पर यह दिन अप्रैल या मई के महीने में आता है।

वरुथिनी एकादशी दुर्भाग्यपूर्ण महिला को भाग्यशाली महिला में बदलने के लिए मनाई जाती है। ऐसी भी मान्यता है कि यदि कोई पंगु व्यक्ति वरुथिनी एकादशी व्रत (Varuthini Ekadashi Vrat) करे तो वह सामान्य रूप से चलने में समर्थ हो सकता है।

इस एकादशी का एक और महत्त्व यह है कि इसके प्रभाव से मनुष्य को जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल सकती है। यह दिन विशेष रूप से विष्णु जी के भक्त वैष्णव संप्रदाय के लोगों द्वारा मनाया जाता है।

वरुथिनी एकादशी व्रत (Varuthini Ekadashi Vrat) और वरुथिनी एकादशी व्रत कथा (Varuthini Ekadashi Vrat Katha) के पुण्य प्रभाव से एक सधवा स्त्री को सौभाग्य की प्राप्ति होती है और मनुष्य को अपने शुभ कर्मों के आधार पर स्वर्ग या मोक्ष प्राप्ति होती है।

वरुथिनी एकादशी (Varuthini Ekadashi) के दिन व्रत रखने से मनुष्य पर भगवान श्री विष्णु जी की कृपा होती है और वह अपने दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने में सक्षम हो जाता है। इस प्रकार उसे अपने अच्छे कर्मों के अनुसार स्वर्ग या मोक्ष की प्राप्ति होती है।

हिन्दू धर्म को मानने वाले लोग वरुथिनी एकादशी के दिन उपवास रखते हैं और दुर्भाग्यपूर्ण जीवन को भगवत इच्छा के अनुसार सौभाग्यपूर्ण बनाने के लिए भगवान श्री विष्णु जी की पूजा करते हैं।

ऐसी मान्यता है कि कुरुक्षेत्र में सूर्य ग्रहण के समय स्वर्ण दान करने से जिस फल की प्राप्ति होती है वैसा ही फल वरुथिनी एकादशी व्रत करने से प्राप्त होता है। इस व्रत का पालन करने से मनुष्य इहलोक और परलोक में सुख प्राप्त करते हैं तथा अन्त में स्वर्ग के भागी भी बनते हैं।

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इस लेख में हम वरुथिनी एकादशी व्रत (Varuthini Ekadashi Vrat), वरुथिनी एकादशी व्रत विधि (Varuthini Ekadashi Vrat Vidhi) और वरुथिनी एकादशी व्रत कथा (Varuthini Ekadashi Vrat Katha) के बारे में जानेंगे।

वरुथिनी एकादशी व्रत और वरुथिनी एकादशी व्रत कथा कब करनी चाहिए? (When to do Varuthini Ekadashi Vrat and Varuthini Ekadashi Vrat Katha?)

वरुथिनी एकादशी व्रत (Varuthini Ekadashi Vrat) और वरुथिनी एकादशी व्रत कथा (Varuthini Ekadashi Vrat Katha) ईश्वर से सुख प्राप्ति, अपने दुर्भाग्यपूर्ण जीवन को सौभाग्यपूर्ण जीवन में परिवर्तित करने के लिए, स्वर्ग तथा मोक्ष प्राप्ति के लिए और आध्यात्मिक सफाई के बारे में है।

यह दिन भगवान विष्णु जी को समर्पित है। हिंदू मान्यता के अनुसार एक चंद्र चरण के दो अलग-अलग चरण होते हैं – कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। प्रत्येक चरण (पक्ष) 14 दिनों का होता है। इन दोनों पक्षों को ही हिन्दू कैलेंडर माह के पक्ष भी कहा जाता है।

दोनों पक्षों के ग्यारहवें दिन को एकादशी कहा जाता है। इसलिए एक माह में दो एकादशी के दिन आते हैं। इस दिन रखे जाने वाले व्रत या कर्मकांड को एकादशी व्रत कहा जाता है और दुनिया भर में लाखों हिंदुओं द्वारा मनाया जाता है।

वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरुथिनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन ही वरुथिनी एकादशी व्रत (Varuthini Ekadashi Vrat) तथा वरुथिनी एकादशी व्रत कथा (Varuthini Ekadashi Vrat Katha) रखनी चाहिए।

वरुथिनी एकादशी व्रत (Varuthini Ekadashi Vrat) एक दिन पहले सूर्यास्त से शुरू होकर एकादशी के अगले दिन सूर्योदय के बाद तक रखा जाता है।

वरुथिनी एकादशी व्रत कथा विधि (Varuthini Ekadashi Vrat Katha Vidhi In Hindi)

वरुथिनी एकादशी व्रत (Varuthini Ekadashi Vrat) और वरुथिनी एकादशी व्रत कथा (Varuthini Ekadashi Vrat Katha) की पूजा विधि इस प्रकार है।

  • सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं।
  • घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें।
  • भगवान विष्णु का गंगा जल से अभिषेक करें।
  • भगवान विष्णु को पुष्प और तुलसी अर्पित करें।
  • अगर संभव हो तो इस दिन व्रत भी रखें।
  • व्रत कथा का पाठ करें। (व्रत कथा इस लेख में निचे दी गयी है। कृपया कर के व्रत कथा वहां से पढ़ें।)
  • भगवान की आरती करें। (इस लेख के अंत में एकादशी आरती के लेख का लिंक दिया गया है। उस पर क्लिक कर के आप एकादशी आरती पढ़ सकते हैं।)
  • भगवान को भोग लगाएं। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि भगवान को सिर्फ सात्विक चीजों का भोग लगाया जाता है। भगवान विष्णु के भोग में तुलसी को जरूर शामिल करें। ऐसा माना जाता है कि बिना तुलसी के भगवान विष्णु भोग ग्रहण नहीं करते हैं।
  • इस पावन दिन भगवान विष्णु के साथ ही माता लक्ष्मी की पूजा भी करें।
  • इस दिन भगवान का अधिक से अधिक ध्यान करें।
  • अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत खोलें और सात्विक भोजन करें। बहुत से लोग व्रत के दौरान फलाहार ग्रहण करते हैं और कुछ लोग कुछ भी खाना ग्रहण नहीं करते। यहाँ तक की पानी भी ग्रहण नहीं करते। परन्तु आप व्रत के दौरान फलाहार ग्रहण कर सकते हैं।
  • इस दिन भगवान श्री विष्णु जी के वराह अवतार की पूजा की जाती है।
  • इस दिन व्रत करने वाले को निम्नलिखित चीज़ों का त्याग करना चाहिए।
    • मांस
    • कांसे के बर्तन में भोजन
    • मसूर की दाल
    • चना
    • कोदों (कोदरा)
    • शाक
    • मधु (शहद)
    • दूसरे का अन्न
    • दूसरी बार भोजन
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वरुथिनी एकादशी व्रत और वरुथिनी एकादशी व्रत कथा के लाभ (Benefits of Varuthini Ekadashi Vrat and Varuthini Ekadashi Vrat Katha)

वरुथिनी एकादशी व्रत (Varuthini Ekadashi Vrat) और वरुथिनी एकादशी व्रत कथा (Varuthini Ekadashi Vrat Katha) का लाभ उन लोगों के लिए है जो भगवान विष्णु की आस्था और पूजा करते हैं।

इसे हिंदू धर्म में सबसे फलदायी व्रतों में से एक माना जाता है। एकादशी व्रत के लाभ आपको शांति, सद्भाव और समृद्धि ला सकते हैं।

इस पवित्र हिंदू अनुष्ठान के भक्त, मन की शांति के साथ अपने दुर्भाग्यपूर्ण जीवन को सौभाग्यपूर्ण जीवन में परिवर्तित करते हैं। इसके साथ ही वे स्वर्ग तथा मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।

वरुथिनी एकादशी व्रत (Varuthini Ekadashi Vrat) और वरुथिनी एकादशी व्रत कथा (Varuthini Ekadashi Vrat Katha) को मनुष्य द्वारा अपने जीवन को सौभाग्यपूर्ण बनाने के लिए अति योग्य माना जाता है।

जो मनुष्य इस महत्त्वपूर्ण वरुथिनी एकादशी व्रत कथा (Varuthini Ekadashi Vrat Katha) को पढ़ता या सुनता है उसे अंत में स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

वरुथिनी एकादशी व्रत कथा (Varuthini Ekadashi Vrat Katha In Hindi)

बहुत समय पहले की बात है। नर्मदा नदी के तट पर एक राज्य स्थित था। उस राज्य के राजा का नाम मान्धाता था। मान्धाता बहुत ही दानवीर और तेजस्वी राजा होने के साथ-साथ तपस्वी राजा भी था।

वह नित्य जंगल में ईश्वर की तपस्या करने जाता था। एक दिन की बात है राजा मान्धाता जंगल में तपस्या कर रहा था कि तभी झाड़ियों के बीच से एक जंगली भालू आया।

राजा अपनी तपस्या में लीन था और भालू उसके पैर चबाने लगा। तभी उसकी तपस्या भंग हुई और उसे आभास हुआ कि भालू उसके पैर चबा रहा है। भालू उसे उसके पैरों से घसीटता हुआ घने जंगल में ले गया।

राजा बहुत घबरा गया और राजा मान्धाता ने भगवान श्री विष्णु जी से प्रार्थना की – “हे परम पिता परमेश्वर श्री विष्णु भगवान! मुझ पर कृपा करो और इस विघ्न से मुझे बचाओ।”

अपने भक्त की ऐसे समय पर पुकार सुन कर वहां पर श्री विष्णु भगवान जी प्रकट हुए और मान्धाता की उस जंगली भालू से रक्षा की। परन्तु राजा के पैर भालू खा चूका था और इस बात से राजा बहुत ही दुःखी था।

राजा दुःख में अपने आंसू नहीं रोक पाया और बहुत रोने लगा। अपने भक्त की यह दशा देख कर भगवान श्री विष्णु जी बोले – “हे वत्स मान्धाता! तुम रोओ मत और शीघ्र ही मथुरा जाओ।

वहां जाकर तुम वैशाख माह की कृष्ण एकादशी के दिन आने वाली वरुथिनी एकादशी का व्रत करो। व्रत करते हुए मेरे वराह अवतार का पूजन करो और व्रत कथा का पाठ करो।

इस व्रत के पुण्य प्रभाव से तुम पुनः चलने में सक्षम हो जाओगे और सुदृढ़ अंगों वाले हो जाओगे। भगवान विष्णु ने मान्धाता को बताया कि यह जो भालू था इसका और तुम्हारा रिश्ता पूर्व जन्म का था।

तुम्हारे द्वारा पूर्व जन्म में किये गए दुराचार के कारण ही इसने तुम्हारा पैर काट खाया। इस प्रकार यह तुम्हारा पूर्व जन्म में किये गए कर्मों के अनुसार प्रारब्ध था।

भगवान श्री विष्णु जी की आज्ञा लेकर मान्धाता मथुरा गया और विधि-विधान के साथ वरुथिनी एकादशी के व्रत का पालन किया। इस व्रत के पुण्य प्रभाव से मान्धाता फिर से सम्पूर्ण अंगों वाला हो गया और मृत्यु के बाद उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति हुई।

जो भी मनुष्य अपने दुर्भाग्य से पीड़ित है उसे वरूथिनी एकादशी का व्रत तथा वरुथिनी एकादशी व्रत कथा (Varuthini Ekadashi Vrat Katha) करनी चाहिए। इस प्रकार इस व्रत का पालन करने से समस्त दुर्भाग्य का नाश होकर मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इस कथा से हमें वरुथिनी एकादशी व्रत (Varuthini Ekadashi Vrat) और वरुथिनी एकादशी व्रत कथा (Varuthini Ekadashi Vrat Katha) का महत्त्व पता चलता है।

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