रमा एकादशी व्रत कथा (Rama Ekadashi Vrat Katha In Hindi)


रमा एकादशी व्रत कथा (Rama Ekadashi Vrat Katha In Hindi)

रमा एकादशी (Rama Ekadashi) हिंदू धर्म में एक पवित्र दिन माना जाता है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार यह दिन कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन होता है।

ऐसी मान्यता है कि रमा एकादशी के दिन व्रत का पालन करने से मनुष्य के बड़े से बड़े पाप नष्ट होते हैं और व्यक्ति को स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

रमा एकादशी व्रत (Rama Ekadashi Vrat) और रमा एकादशी व्रत कथा (Rama Ekadashi Vrat Katha) के पुण्य प्रभाव से भक्त पर भगवान श्री विष्णु जी की कृपा होती है और जीवन में आई अस्थिरता को स्थिर करने में यह व्रत बहुत ही फलदायी है।

रमा एकादशी व्रत (Rama Ekadashi Vrat) और रमा एकादशी व्रत कथा (Rama Ekadashi Vrat Katha) के पुण्य फल से मनुष्य को अपने जीवन में किये गए बुरे कर्मों से मुक्ति मिल जाती है।

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इस लेख में हम रमा एकादशी व्रत (Rama Ekadashi Vrat), रमा एकादशी व्रत विधि (Rama Ekadashi Vrat Vidhi) और रमा एकादशी व्रत कथा (Rama Ekadashi Vrat Katha) के बारे में जानेंगे।

रमा एकादशी व्रत और रमा एकादशी व्रत कथा कब करनी चाहिए? (When to do Rama Ekadashi Vrat and Rama Ekadashi Vrat Katha?)

रमा एकादशी व्रत (Rama Ekadashi Vrat) और रमा एकादशी व्रत कथा (Rama Ekadashi Vrat Katha) ईश्वर से सुख प्राप्ति, बड़े से बड़े पापों से मुक्ति, अस्थिर जीवन में स्थिरता और आध्यात्मिक सफाई के बारे में है।

यह दिन भगवान विष्णु जी को समर्पित है। हिंदू मान्यता के अनुसार एक चंद्र चरण के दो अलग-अलग चरण होते हैं – कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। प्रत्येक चरण (पक्ष) 14 दिनों का होता है। इन दोनों पक्षों को ही हिन्दू कैलेंडर माह के पक्ष भी कहा जाता है।

दोनों पक्षों के ग्यारहवें दिन को एकादशी कहा जाता है। इसलिए एक माह में दो एकादशी के दिन आते हैं। इस दिन रखे जाने वाले व्रत या कर्मकांड को एकादशी व्रत कहा जाता है और दुनिया भर में लाखों हिंदुओं द्वारा मनाया जाता है।

कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रमा एकादशी कहा जाता है। इस दिन ही रमा एकादशी व्रत (Rama Ekadashi Vrat) तथा रमा एकादशी व्रत कथा (Rama Ekadashi Vrat Katha) रखनी चाहिए।

रमा एकादशी व्रत (Rama Ekadashi Vrat) एक दिन पहले सूर्यास्त से शुरू होकर एकादशी के अगले दिन सूर्योदय के बाद तक रखा जाता है।

रमा एकादशी व्रत कथा विधि (Rama Ekadashi Vrat Katha Vidhi In Hindi)

रमा एकादशी व्रत (Rama Ekadashi Vrat) और रमा एकादशी व्रत कथा (Rama Ekadashi Vrat Katha) की पूजा विधि इस प्रकार है।

  • सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं।
  • घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें।
  • भगवान विष्णु का गंगा जल से अभिषेक करें।
  • भगवान विष्णु को पुष्प और तुलसी अर्पित करें।
  • अगर संभव हो तो इस दिन व्रत भी रखें।
  • व्रत कथा का पाठ करें। (व्रत कथा इस लेख में निचे दी गयी है। कृपया कर के व्रत कथा वहां से पढ़ें।)
  • भगवान की आरती करें। (इस लेख के अंत में एकादशी आरती के लेख का लिंक दिया गया है। उस पर क्लिक कर के आप एकादशी आरती पढ़ सकते हैं।)
  • भगवान को भोग लगाएं। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि भगवान को सिर्फ सात्विक चीजों का भोग लगाया जाता है। भगवान विष्णु के भोग में तुलसी को जरूर शामिल करें। ऐसा माना जाता है कि बिना तुलसी के भगवान विष्णु भोग ग्रहण नहीं करते हैं।
  • इस पावन दिन भगवान विष्णु के साथ ही माता लक्ष्मी की पूजा भी करें।
  • इस दिन भगवान का अधिक से अधिक ध्यान करें।
  • अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत खोलें और सात्विक भोजन करें। बहुत से लोग व्रत के दौरान फलाहार ग्रहण करते हैं और कुछ लोग कुछ भी खाना ग्रहण नहीं करते। यहाँ तक की पानी भी ग्रहण नहीं करते। परन्तु आप व्रत के दौरान फलाहार ग्रहण कर सकते हैं।
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जया एकादशी (Jaya Ekadashi) के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी अपरा एकादशी व्रत कथा (Apara Ekadashi Vrat Katha In Hindi)

रमा एकादशी व्रत और रमा एकादशी व्रत कथा के लाभ (Benefits of Rama Ekadashi Vrat and Rama Ekadashi Vrat Katha)

रमा एकादशी व्रत (Rama Ekadashi Vrat) और रमा एकादशी व्रत कथा (Rama Ekadashi Vrat Katha) का लाभ उन लोगों के लिए है जो भगवान विष्णु की आस्था और पूजा करते हैं।

इसे हिंदू धर्म में सबसे फलदायी व्रतों में से एक माना जाता है। एकादशी व्रत के लाभ आपको शांति, सद्भाव और समृद्धि ला सकते हैं।

इस पवित्र हिंदू अनुष्ठान के भक्त, मन की शांति के साथ बड़े से बड़े पाप से मुक्ति और श्री विष्णु जी की कृपा प्राप्त करते हैं।

रमा एकादशी व्रत (Rama Ekadashi Vrat) और रमा एकादशी व्रत कथा (Rama Ekadashi Vrat Katha) को ईश्वर से अपने द्वारा किये गए बुरे कर्मों से उत्पन्न हुए पापों के नाश तथा अस्थिर जीवन को स्थिर करने के लिए अति योग्य माना जाता है।

जो मनुष्य इस महत्त्वपूर्ण रमा एकादशी व्रत कथा (Rama Ekadashi Vrat Katha) को पढ़ता या सुनता है उसे अंत में स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

रमा एकादशी व्रत कथा (Rama Ekadashi Vrat Katha In Hindi)

प्राचीन काल की बात है। चंद्रवटी नाम की एक नगरी पर मुचुकुंद नाम का एक राजा राज्य करता था। राजा की मित्रता कई देवगणों के साथ थी। इनमें से इंद्रदेव, यमराज, कुबेर, वरुण तथा विभीषण के साथ राजा की घनिष्ट मित्रता थी।

मुचुकुंद राजा की एक बेटी थी। राजा की बेटी का नाम चंद्रभागा था। राजा ने अपनी बेटी का विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र राजकुमार शोभन के साथ करवाया।

एक दिन की बात है शोभन अपने ससुराल मेहमान आया। कुछ ही दिनों में रमा एकादशी का महान दिन भी आने वाला था। रमा एकादशी के दिन राजा मुचुकुंद राज्य में ढोल बजवाकर सन्देश भिजवाते थे कि आज के दिन सभी राज्य के लोग व्रत का पालन करेंगे।

जल्द ही व्रत का दिन पास आ गया। यह जान कर चंद्रभागा के मन में एक चिंता उठी। उसने सोचा कि उसका पति शोभन बहुत ही दुर्बल है और उसके पिता की आज्ञा बहुत ही कठोर है। वह सोच में पड़ गयी कि उसका पति शोभन व्रत कैसे कर पायेगा।

दशमी का दिन आया तो राजा ने ढोल बजवाया और सारे राज्य में घोषणा करवा दी कि एकादशी को भोजन नहीं करना है तथा व्रत का पालन करना है।

राजा द्वारा की गयी घोषणा जैसे ही शोभन ने सुनी तो उसको बहुत चिंता हुई और उसने अपनी पत्नी चंद्रभागा से कहा – “हे प्रिये! अब मैं क्या करूँ? मैं तो किसी प्रकार की भी भूख सहन नहीं कर सकता हूँ। कुछ ऐसा उपाय मुझे बताओ, जिससे मेरे प्राण बच जाएं। नहीं तो मेरे प्राण चले जाएँगे।”

चंद्रभागा ने पति के ऐसा कहने पर पति को उत्तर दिया – “हे स्वामी! मेरे पिता जी की यह घोषणा अति कठोर है और एकादशी के दिन उनके राज्य में कोई भी व्यक्ति भोजन नहीं करता। यहाँ तक घोड़ा, हाथी, बिल्ली, गौ, ऊँट आदि जानवर भी तृण तथा अन्न-जल ग्रहण नहीं कर सकते हैं, फिर मनुष्य के बारे में तो कहना ही क्या?”

चंद्रभागा ने आगे कहा – “परन्तु अगर आप भोजन करना चाहें तो किसी दूसरे स्थान पर चले जाएं, अन्यथा आपको व्रत का पालन करना ही पड़ेगा।”

चंद्रभागा की यह बात सुनकर शोभन ने कहा – “हे प्रिये! अब मैं अवश्य ही व्रत करूँगा। जो मेरे भाग्य में होगा, जैसी ईश्वर की इच्छा।”

यह निर्णय लेकर शोभन ने एकादशी का व्रत रख लिया। परन्तु उसे व्रत के कारण भूख-प्यास से बहुत पीड़ा होने लगी। सुबह होते होते शोभन के भूख-प्यास से प्राण निकल गए।

तब राजा ने अपने पुत्र शोभन का सुगंधित काष्ठ से दाह संस्कार करवाया। लेकिन चंद्रभागा ने अपने पिताश्री की आज्ञा से अपने शरीर को दग्ध नहीं किया और अपने पति शोभन की अंत्येष्टि क्रिया के पश्चात अपने पिताश्री के घर में ही रहने लगी।

रमा एकादशी व्रत के पुण्य प्रभाव से चंद्रभागा के पति शोभन को मंदराचल पर्वत पर धन-धान्य से परिपूर्ण एक सुंदर देवपुर प्राप्त हुआ। शोभन को बहुमूल्य वस्त्र तथा आभूषण प्राप्त हुए।

गंधर्व और अप्सराओं की उपस्थिति से शोभन के महल की सभा सुसज्जित थी तथा स्वर्ण सिंहासन पर बैठा हुआ शोभन इंद्र देव से कम नहीं लग रहा था।

समय बिता और चंद्रवटी नगर में सोम शर्मा नाम का एक ब्राह्मण तीर्थयात्रा करता हुआ घूमता-घूमता मंदराचल पर्वत पहुंचा और उसने शोभन को पहचान लिया।

सोम शर्मा ने शोभन को पहचान लिया कि शोभन राजा मुचुकुंद का दामाद है। शोभन ने भी सोम शर्मा को पहचान कर प्रणाम किया। ब्राह्मण ने शोभन को बताया कि राजा मुचुकुंद और उसकी पत्नी कुशल-मंगल हैं।

सोम शर्मा ने शोभन को नगर के सभी लोगों के कुशल मंगल होने का समाचार दिया। अंत में सोम शर्मा ने शोभन से ऐसा सुंदर नगर जो न कभी देखा, न सुना, उसके बारे में प्रश्न किया कि उसे यह सब राज्य कैसे मिला।

इसके बाद शोभन सोम शर्मा से बोला कि कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी का व्रत करने से मुझे यह राज्य प्राप्त हुआ, लेकिन यह सब जो मुझे प्राप्त हुआ, सब अस्थिर है।

शोभन ने सोम शर्मा से अस्थिर राज्य होने का कारण बताया कि एकादशी का व्रत उसने श्रद्धारहित होकर किया था। इस वजह से राज्य में सब कुछ अस्थिर है।

शोभन ने सोम शर्मा को यह सारी बात चंद्रभागा को बताने के लिए कही और कहा कि चंद्रभागा की भक्ति से ही अब यह राज्य स्थिर हो सकता है।

सोम शर्मा जब वापस चंद्रवटी पहुंचा तो उसने सब कुछ चंद्रभागा को बताया। चंद्रभागा यह सुन कर अति प्रसन्न हुई और जल्द से जल्द उसने अपने पति शोभन से मिलना चाहा।

चंद्रभागा ने सोम शर्मा से कहा कि वह उसे जल्द से जल्द शोभन के पास ले चले परन्तु शोभन सबसे पहले चंद्रभागा को ऋषि वामदेव के आश्रम लेकर गया।

ऋषि वामदेव ने सारी बात जानकार अपनी योग शक्ति से चंद्रभागा का अभिषेक कर दिया और तब योगशक्ति के प्रभाव तथा एकादशी के व्रत से चंद्रभागा का शरीर दिव्य गति को प्राप्त हो गया।

इसके बाद चंद्रभागा अपने पति शोभन के पास गयी। अपनी पत्नी को देखकर शोभन को बहुत प्रसन्नता हुई। शोभन ने उसे अपने पास बुलाकर अपने सिंहासन के बाईं तरफ बिठा दिया।

चंद्रभागा ने शोभन से कहा – “हे स्वामी! आप मेरे पुण्य को ग्रहण कीजिए।” ऐसा कहकर उसने अपने एकादशी के व्रतों का पुण्य फल शोभन को समर्पित कर दिया।

चंद्रभागा आठ वर्ष की थी तब से विधि अनुसार एकादशी के व्रत का पालन करती आ रही थी। इस व्रत के पुण्य प्रभाव से राजा का नगर स्थिर हो गया तथा समस्त अच्छे कर्मों से युक्त होकर प्रलय के अंत तक रहा।

चंद्रभागा भी अपने पति के साथ आनंदपूर्वक रहने लगी। इस प्रकार रमा एकादशी के व्रत का विधिपूर्वक पालन करके तथा रमा एकादशी व्रत कथा (Rama Ekadashi Vrat Katha) का पाठ करके चंद्रभागा और शोभन को अति आनंदमयी जीवन की प्राप्ति हुई।

इस कथा से हमें रमा एकादशी व्रत (Rama Ekadashi Vrat) और रमा एकादशी व्रत कथा (Rama Ekadashi Vrat Katha) का महत्त्व पता चलता है।

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