पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा (Pausha Putrada Ekadashi Vrat Katha In Hindi)


पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा (Pausha Putrada Ekadashi Vrat Katha In Hindi)

पौष पुत्रदा एकादशी (Pausha Putrada Ekadashi) हिंदू धर्म में एक पवित्र दिन मन जाता है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार यह दिन पौष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन होता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह दिन दिसंबर या जनवरी के महीने में आता है।

श्रावण माह में भी एक पुत्रदा एकादशी आती है परन्तु यह उस से अलग है क्यूंकि यह पौष माह में आती है इसलिए इसे पौष पुत्रदा एकादशी कहा जाता है।

हिन्दू धर्म को मानने वाले लोग इस दिन उपवास रखते हैं और अच्छे पुत्र के लिए भगवान श्री विष्णु जी की पूजा करते हैं। यह दिन विशेष रूप से विष्णु जी के भक्त वैष्णव संप्रदाय के लोगों द्वारा मनाया जाता है।

हिंदू समाज में संतानों को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि वह जीवन में माता-पिता के बुढ़ापे में उनकी देखभाल करते हैं और माता पिता की मृत्यु के बाद श्राद्ध और पिंड दान करते हैं।

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इस लेख में हम पौष पुत्रदा एकादशी व्रत (Pausha Putrada Ekadashi Vrat), पौष पुत्रदा एकादशी व्रत विधि (Pausha Putrada Ekadashi Vrat Vidhi) और पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा (Pausha Putrada Ekadashi Vrat Katha) के बारे में जानेंगे।

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत और पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा कब करनी चाहिए? (When to do Pausha Putrada Ekadashi Vrat and Pausha Putrada Ekadashi Vrat Katha)

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत (Pausha Putrada Ekadashi Vrat) और पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा (Pausha Putrada Ekadashi Vrat Katha) ईश्वर से सुख प्राप्ति और आध्यात्मिक सफाई के बारे में है।

यह दिन भगवान विष्णु जी को समर्पित है। हिंदू मान्यता के अनुसार चंद्र चरण के दो अलग-अलग चरण होते हैं – कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। प्रत्येक चरण (पक्ष) 14 दिनों का होता है। इन दोनों पक्षों को ही हिन्दू कैलेंडर माह के पक्ष भी कहा जाता है।

दोनों पक्षों के ग्यारहवें दिन को एकादशी कहा जाता है। इसलिए एक माह में दो एकादशी के दिन आते हैं। इस दिन रखे जाने वाले व्रत या कर्मकांड को एकादशी व्रत कहा जाता है और दुनिया भर में लाखों हिंदुओं द्वारा मनाया जाता है।

पौष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पौष पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। इस दिन ही पौष पुत्रदा एकादशी व्रत (Pausha Putrada Ekadashi Vrat) तथा पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा (Pausha Putrada Ekadashi Vrat Katha) रखनी चाहिए।

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत एक दिन पहले सूर्यास्त से शुरू होकर एकादशी के अगले दिन सूर्योदय के बाद तक रखा जाता है।

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा विधि (Pausha Putrada Ekadashi Vrat Katha Vidhi In Hindi)

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत (Pausha Putrada Ekadashi Vrat) और पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा (Pausha Putrada Ekadashi Vrat Katha) की पूजा विधि इस प्रकार है।

  • सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं।
  • घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें।
  • भगवान विष्णु का गंगा जल से अभिषेक करें।
  • भगवान विष्णु को पुष्प और तुलसी अर्पित करें।
  • अगर संभव हो तो इस दिन व्रत भी रखें।
  • व्रत कथा का पाठ करें। (व्रत कथा इस लेख में निचे दी गयी है। कृपया कर के व्रत कथा वहां से पढ़ें।)
  • भगवान की आरती करें। (इस लेख के अंत में एकादशी आरती के लेख का लिंक दिया गया है। उस पर क्लिक कर के आप एकादशी आरती पढ़ सकते हैं।)
  • भगवान को भोग लगाएं। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि भगवान को सिर्फ सात्विक चीजों का भोग लगाया जाता है। भगवान विष्णु के भोग में तुलसी को जरूर शामिल करें। ऐसा माना जाता है कि बिना तुलसी के भगवान विष्णु भोग ग्रहण नहीं करते हैं।
  • इस पावन दिन भगवान विष्णु के साथ ही माता लक्ष्मी की पूजा भी करें।
  • इस दिन भगवान का अधिक से अधिक ध्यान करें।
  • अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत खोलें और सात्विक भोजन करें। बहुत से लोग व्रत के दौरान फलाहार ग्रहण करते हैं और कुछ लोग कुछ भी खाना ग्रहण नहीं करते। यहाँ तक की पानी भी ग्रहण नहीं करते। परन्तु आप व्रत के दौरान फलाहार ग्रहण कर सकते हैं।
इस महत्वपूर्ण लेख को भी पढ़ें - जया एकादशी (Jaya Ekadashi) के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी
पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा (Pausha Putrada Ekadashi Vrat Katha In Hindi)

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत और पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा के लाभ (Benefits of Pausha Putrada Ekadashi Vrat and Pausha Putrada Ekadashi Vrat Katha)

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत (Pausha Putrada Ekadashi Vrat) और पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा (Pausha Putrada Ekadashi Vrat Katha) का लाभ उन लोगों के लिए है जो भगवान विष्णु की आस्था और पूजा करते हैं।

इसे हिंदू धर्म में सबसे फलदायी व्रतों में से एक माना जाता है। एकादशी व्रत के लाभ आपको शांति, सद्भाव और समृद्धि ला सकते हैं। इस पवित्र हिंदू अनुष्ठान के भक्त मन की शांति और समृद्धि प्राप्त करते हैं।

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत (Pausha Putrada Ekadashi Vrat) और पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा (Pausha Putrada Ekadashi Vrat Katha) पुत्र प्राप्ति की इच्छा के लिए अति योग्य माना जाता है।

जो मनुष्य इस माहात्म्य पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा (Pausha Putrada Ekadashi Vrat Katha) को पढ़ता या सुनता है उसे अंत में स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा (Pausha Putrada Ekadashi Vrat Katha In Hindi)

भद्रावती नामक नगर में सुकेतुमान नाम का एक राजा था। राजा के कोई पुत्र नहीं था। उसकी पत्नी का नाम शैव्या था। वह पुत्र न होने के कारण सदैव चिंतित रहती थी।

राजा के पितर पूर्वज भी रोकर पिंड लिया करते थे और सोचा करते थे कि राजा के मरने बाद हमको कौन पिंड देगा। राजा को भाई, बाँधव, धन, हाथी, घोड़े, राज्य और मंत्री इन सबमें से किसी से भी संतोष नहीं होता था और बहुत दुखी रहता था।

राजा सदैव यही विचार करता था कि मेरे मरने के बाद मुझको कौन पिंडदान देगा। वह हमेशा यही सोचता रहता कि बिना पुत्र के पितरों और देवताओं का ऋण मैं कैसे चुका सकूँगा।

उसका मानना था कि जिस घर में पुत्र न हो उस घर में सदैव अँधेरा ही रहता है। जिस माता पिता ने पुत्र का मुख देखा है, वे धन्य हैं। उनको इस लोक में यश और परलोक में शांति मिलती है अर्थात उनके दोनों लोक सुधर जाते हैं।

पूर्व जन्म के कर्मों से ही इस जन्म में पुत्र, धन और यश कि प्राप्ति होती है। राजा इसी प्रकार रात-दिन चिंता में डूबा रहता था। एक समय तो राजा ने अपने शरीर को त्यागने का निश्चय किया।

परंतु आत्महत्या को महान पाप समझकर राजा ने ऐसा नहीं किया। एक दिन राजा ऐसा ही सोचता हुआ अपने घोड़े पर बैठ कर वन की ओर चल दिया। वन में राजा पक्षियों और वृक्षों को देखने लगा।

राजा ने देखा कि वन में मृग, सूअर, शेर और बंदर आदि सब भ्रमण कर रहे थे। हाथी अपने बच्चों और हथिनियों के बीच घूम रहा था। इस वन में कहीं तो गीदड़ अपने कर्कश स्वर में बोल रहे थे, कहीं उल्लू ध्वनि कर रहे थे।

वन के दृश्यों को देखकर राजा सोच में पड़ गया। इसी प्रकार आधा दिन बीत गया और राजा सोचने लगा कि मैंने कई यज्ञ किए, ब्राह्मणों को स्वादिष्ट भोजन करवाया फिर भी मुझको दु:ख ही प्राप्त हुआ, आखिर क्यों?

राजा प्यास लगने की वजह से अत्यंत दु:खी हो गया और पानी की तलाश में इधर-उधर घूमने लगा। थोड़ी दूरी पर राजा ने एक तालाब देखा। उस तालाब में कमल खिले थे।

सारस, हंस और मगरमच्छ आदि तालाब में विहार कर रहे थे। उस तालाब के चारों तरफ ऋषि-मुनियों के आश्रम बने हुए थे। उसी समय राजा की दाहिनी आंख फड़कने लगी।

राजा शुभ शकुन समझकर घोड़े से उतरकर मुनियों को दंडवत प्रणाम करके वहां बैठ गया। राजा को देखकर ऋषि-मुनियों ने कहा – हे राजन! हम तुमसे अत्यंत प्रसन्न हुए। तुम्हारी क्या इच्छा है, हमसे कहो?

राजा ने उनसे पूछा – महाराज आप कौन हैं? आप लोग किसलिए यहाँ आए हैं, कृपा करके मुझे बताइए? मुनि कहने लगे कि हे राजन! आज संतान प्रदान करने वाली पौष पुत्रदा एकादशी है, हम लोग विश्वदेव हैं और इस तालाब में स्नान करने के लिए आए हैं।

यह सुनकर राजा ने उनसे कहा कि महाराज मेरे भी कोई संतान नहीं है, यदि आप लोग मुझ से प्रसन्न हैं तो एक पुत्र का वरदान दीजिए। मुनि बोले – हे राजन! आज पुत्रदा एकादशी है। आप इसका व्रत कीजिए, ईश्वर की कृपा से अवश्य ही आपके घर में पुत्र होगा।

मुनियों की बात सुनकर राजा ने उसी दिन पौष पुत्रदा एकादशी का ‍व्रत किया और द्वादशी को उसका पारण किया। कुछ समय के बाद रानी ने गर्भ धारण किया और नौ महीने के बाद उनके एक पुत्र हुआ।

बड़े होकर राजकुमार अत्यंत शूरवीर, यशस्वी और प्रजा का पालक हुआ।

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