मोहिनी एकादशी व्रत कथा (Mohini Ekadashi Vrat Katha In Hindi)


मोहिनी एकादशी व्रत कथा (Mohini Ekadashi Vrat Katha In Hindi)

मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi) हिंदू धर्म में एक पवित्र दिन माना जाता है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार यह दिन वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन होता है।

मोहिनी एकादशी मोहजाल से मुक्ति प्राप्त करने के लिए मनाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि इस पवित्र दिन को मोहिनी एकादशी व्रत (Mohini Ekadashi Vrat) का पालन करने से मनुष्य को मोहजाल और ऐसे कर्मों से छुटकारा पाने में सहायता मिलती है जो मनुष्य को नरक में धकेलते हैं।

रामायण काल में भी मोहिनी एकादशी का वर्णन मिलता है जब भगवान श्री राम चंद्र जी महर्षि वशिष्ट से पूछते हैं – “हे गुरुदेव! कोई ऐसा उपाय बताइये जिस से मोह से उत्पन्न हुए कर्मों के बुरे प्रभाव को मिटाया जा सके। मैंने सीता के वियोग में बहुत दुःख भोगा है। अब आप मुझ पर मोह द्वारा उत्पन्न हुए पाप को नष्ट करने का निवारण बता कर कृपा करें।”

श्री राम चंद्र जी की बात सुन कर के महर्षि वशिष्ट कहते हैं – “हे राम! वैशाख माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। मोहिनी एकादशी के दिन जो मनुष्य व्रत और कथा का पालन करता है उसे किसी भी प्रकार के मोह से छुटकारा मिलता है और मोह उस मनुष्य को कमज़ोर नहीं कर पाता।”

मोहिनी एकादशी व्रत (Mohini Ekadashi Vrat) और मोहिनी एकादशी व्रत कथा (Mohini Ekadashi Vrat Katha) के पुण्य प्रभाव से मनुष्य किसी भी प्रकार के मोह से मुक्ति प्राप्त करता है और एक संयम भरा जीवन व्यतीत करता है।

मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi) के दिन व्रत रखने से मनुष्य पर भगवान श्री विष्णु जी की कृपा होती है और वह अपने आप को मोह के प्रति दृढ़ कर पता है और साथ ही नरक में धकेलने वाले पापों से मुक्ति प्राप्त करता है।

काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार, यह 5 ऐसे कर्म हैं जिनसे हिन्दू धर्म में मनुष्य को बचने के लिए कहा गया है। यह दिन विशेष रूप से विष्णु जी के भक्त वैष्णव संप्रदाय के लोगों द्वारा मनाया जाता है।

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इस लेख में हम मोहिनी एकादशी व्रत (Mohini Ekadashi Vrat), मोहिनी एकादशी व्रत कथा विधि (Mohini Ekadashi Vrat Vidhi) और मोहिनी एकादशी व्रत कथा (Mohini Ekadashi Vrat Katha) के बारे में जानेंगे।

मोहिनी एकादशी व्रत और मोहिनी एकादशी व्रत कथा कब करनी चाहिए? (When to do Mohini Ekadashi Vrat and Mohini Ekadashi Vrat Katha?)

मोहिनी एकादशी व्रत (Mohini Ekadashi Vrat) और मोहिनी एकादशी व्रत कथा (Mohini Ekadashi Vrat Katha) ईश्वर से सुख प्राप्ति, मोह के प्रभाव से उत्पन्न हुए कर्मों के दुष्प्रभाव से मुक्ति, नरक में धकेलने वाले पापों से मुक्ति और आध्यात्मिक सफाई के बारे में है।

यह दिन भगवान विष्णु जी को समर्पित है। हिंदू मान्यता के अनुसार एक चंद्र चरण के दो अलग-अलग चरण होते हैं – कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। प्रत्येक चरण (पक्ष) 14 दिनों का होता है। इन दोनों पक्षों को ही हिन्दू कैलेंडर माह के पक्ष भी कहा जाता है।

दोनों पक्षों के ग्यारहवें दिन को एकादशी कहा जाता है। इसलिए एक माह में दो एकादशी के दिन आते हैं। इस दिन रखे जाने वाले व्रत या कर्मकांड को एकादशी व्रत कहा जाता है और दुनिया भर में लाखों हिंदुओं द्वारा मनाया जाता है।

वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन ही मोहिनी एकादशी व्रत (Mohini Ekadashi Vrat) तथा मोहिनी एकादशी व्रत कथा (Mohini Ekadashi Vrat Katha) रखनी चाहिए।

मोहिनी एकादशी व्रत (Mohini Ekadashi Vrat) एक दिन पहले सूर्यास्त से शुरू होकर एकादशी के अगले दिन सूर्योदय के बाद तक रखा जाता है।

मोहिनी एकादशी व्रत कथा विधि (Mohini Ekadashi Vrat Katha Vidhi In Hindi)

मोहिनी एकादशी व्रत (Mohini Ekadashi Vrat) और मोहिनी एकादशी व्रत कथा (Mohini Ekadashi Vrat Katha) की पूजा विधि इस प्रकार है।

  • सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं।
  • घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें।
  • भगवान विष्णु का गंगा जल से अभिषेक करें।
  • भगवान विष्णु को पुष्प और तुलसी अर्पित करें।
  • अगर संभव हो तो इस दिन व्रत भी रखें।
  • व्रत कथा का पाठ करें। (व्रत कथा इस लेख में निचे दी गयी है। कृपया कर के व्रत कथा वहां से पढ़ें।)
  • भगवान की आरती करें। (इस लेख के अंत में एकादशी आरती के लेख का लिंक दिया गया है। उस पर क्लिक कर के आप एकादशी आरती पढ़ सकते हैं।)
  • भगवान को भोग लगाएं। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि भगवान को सिर्फ सात्विक चीजों का भोग लगाया जाता है। भगवान विष्णु के भोग में तुलसी को जरूर शामिल करें। ऐसा माना जाता है कि बिना तुलसी के भगवान विष्णु भोग ग्रहण नहीं करते हैं।
  • इस पावन दिन भगवान विष्णु के साथ ही माता लक्ष्मी की पूजा भी करें।
  • इस दिन भगवान का अधिक से अधिक ध्यान करें।
  • अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत खोलें और सात्विक भोजन करें। बहुत से लोग व्रत के दौरान फलाहार ग्रहण करते हैं और कुछ लोग कुछ भी खाना ग्रहण नहीं करते। यहाँ तक की पानी भी ग्रहण नहीं करते। परन्तु आप व्रत के दौरान फलाहार ग्रहण कर सकते हैं।
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मोहिनी एकादशी व्रत और मोहिनी एकादशी व्रत कथा के लाभ (Benefits of Mohini Ekadashi Vrat and Mohini Ekadashi Vrat Katha)

मोहिनी एकादशी व्रत (Mohini Ekadashi Vrat) और मोहिनी एकादशी व्रत कथा (Mohini Ekadashi Vrat Katha) का लाभ उन लोगों के लिए है जो भगवान विष्णु की आस्था और पूजा करते हैं।

इसे हिंदू धर्म में सबसे फलदायी व्रतों में से एक माना जाता है। एकादशी व्रत के लाभ आपको शांति, सद्भाव और समृद्धि ला सकते हैं।

इस पवित्र हिंदू अनुष्ठान के भक्त, मन की शांति के साथ मोह के प्रभाव से उत्पन्न हुए कर्मों के दुष्प्रभाव से मुक्ति और नरक में धकेलने वाले पापों से मुक्ति प्राप्त करते हैं।

मोहिनी एकादशी व्रत (Mohini Ekadashi Vrat) और मोहिनी एकादशी व्रत कथा (Mohini Ekadashi Vrat Katha) को मनुष्य द्वारा अपने मोहग्रस्त जीवन को सुदृढ़ करके बुरा जीवन भोगने से बचने के लिए अति योग्य माना जाता है।

जो मनुष्य इस महत्त्वपूर्ण मोहिनी एकादशी व्रत कथा (Mohini Ekadashi Vrat Katha) को पढ़ता या सुनता है उसे अंत में स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

मोहिनी एकादशी व्रत कथा (Mohini Ekadashi Vrat Katha In Hindi)

प्राचीन काल की बात है। सरस्वती नदी के रमणीय तट पर भद्रावती नाम का एक बहुत सूंदर नगर हुआ करता था। उस नगर का राजा चंद्रवंशी कुल में जन्मा हुआ राजा धृतिमान था। धृतिमान बहुत ही सत्यवादी और तेजस्वी राजा था।

उसी नगर में धन-धान्य से परिपूर्ण एक अति समृद्धशाली वैश्य भी रहता था। इस वैश्य का नाम धनपाल था। धनपाल बहुत ही पुण्यात्मा था और सदा ही पुण्य कर्मों में लगा रहता था।

वह हमेशा नगर के शुभ कार्यों में लगा रहता था। वह कभी लोगों के लिए प्याऊ बनवाता तो कभी कुआँ, मठ, बगीचा बनवा देता था। कई ज़रूरतमंद लोगों के लिए तो उसने घरों का निर्माण भी किया था।

अच्छे कार्य करने के साथ-साथ धनपाल का भजन में भी बहुत मन लगता था और वह श्री विष्णु भगवान जी का बहुत बड़ा भक्त था।

धनपाल के 5 पुत्र थे। उनके नाम इस प्रकार थे – धृष्टबुद्धि, सुकृत, मेधावी, द्युतिमान और सुमना। धृष्टबुद्धि बहुत ही पापी था और वह हमेशा बुरे कर्मों में संलग्न रहता था। वह दिन में ज़्यादातर समय जुआ खेलता रहता था और वैश्याओं के लिए आसक्त था।

वह अपने पिता का मेहनत से कमाया हुआ धन बर्बाद कर रहा था। एक दिन की बात है धनपाल ने तंग आकर उसे घर से निष्काषित कर दिया और धृष्ट्बुद्धि घर के बिना दर-दर भटकने लगा।

इसी तरह जगह जगह भटकते हुए भूख-प्यास से व्याकुल होकर धृष्ट्बुद्धि महर्षि कौटिन्य के आश्रम में पहुंचा। वह स्त्री मोह और बुरे कर्मों के प्रभाव से बहुत दुःखी था।

दुःखी मन से उसने महर्षि कौटिन्य से कहा – “हे महर्षि! मुझ पर दया कीजिये और कोई ऐसा उपाय बताइये कि मैं फिर से अच्छा जीवन व्यतीत कर पाऊं और मेरी इस तुच्छ जीवन से मुक्ति हो सके।”

महर्षि कौटिन्य ने कहा – “हे वत्स! तुम वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन व्रत का पालन करो। इस दिन को मोहिनी एकादशी का दिन भी कहते हैं।”

“इस पवित्र दिन को व्रत का पालन करने पर तुम्हे शांति मिलेगी। इस पावन व्रत के पुण्य प्रभाव से मनुष्य को अनेक जन्मों में किये गए मोहग्रस्त पापों से छुटकारा मिलता है।”

महर्षि कौटिन्य की आज्ञा लेकर धृष्ट्बुद्धि ने मोहिनी एकादशी के व्रत का पालन विधि अनुसार किया और वह निष्पाप हो गया। इस व्रत के प्रभाव से धृष्ट्बुद्धि दिव्य देह धारण कर के गरुड़ पर बैठ कर सभी उपद्रवों से रहित होकर भगवान श्री विष्णु धाम को चला गया।

इस प्रकार यह मोहिनी एकादशी का व्रत अति उत्तम है। व्रत के दिन कथा पढ़ने और सुनने से सहस्त्र (1000) गोदान का फल प्राप्त होता है।

इस कथा से हमें मोहिनी एकादशी व्रत (Mohini Ekadashi Vrat) और मोहिनी एकादशी व्रत कथा (Mohini Ekadashi Vrat Katha) का महत्त्व पता चलता है।

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