Mangalvar Vrat Katha (मंगलवार व्रत कथा) In Hindi


Mangalvar Vrat Katha (मंगलवार व्रत कथा) In Hindi

मंगलवार का दिन हनुमान जी को समर्पित है। भक्त इस दिन हनुमान चालीसा और भगवान हनुमान को समर्पित गीत भी सुनते हैं। मंगलवर व्रत भगवान हनुमान को समर्पित है। मंगल के सभी अशुभ प्रभावों को दूर करने के लिए मंगलावर व्रत और Mangalvar Vrat Katha (मंगलवार व्रत कथा) बहुत फायदेमंद है। लगातार 21 सप्ताह तक मंगलवर व्रत और Mangalvar Vrat Katha (मंगलवार व्रत कथा) रखनी चाहिए।

इस दिन लाल रंग के वस्त्र धारण करने के साथ-साथ लाल फूलों से हनुमान जी की पूजा की जाती है। Mangalvar Vrat Katha (मंगलवार व्रत कथा) के साथ हनुमान चालीसा का पाठ भी किया जाता है। इस दिन भक्त गेहूं और गुड़ से बना भोजन ही खाते हैं। मंगलवर व्रत पेशेवर और व्यक्तिगत जीवन दोनों में सफलता, खुशी, सुरक्षा और स्थिरता की ओर ले जाता है। यह दुश्मनों पर काबू पाने में भी मदद करता है।

यह पूरे दिन का उपवास है। जो भक्त मंगलवर उपवास और Mangalvar Vrat Katha (मंगलवार व्रत कथा) करते हैं वे केवल एक बार भोजन करते हैं जिसमें आमतौर पर गेहूं और गुड़ से बना कोई भी भोजन होता है। अधिकांश हिंदू लगातार 21 मंगलवार का व्रत और Mangalvar Vrat Katha (मंगलवार व्रत कथा) रखते हैं। मंगलवर उपवास हनुमान और मंगल को संतुष्ट करने के लिए है, जो इस दिन शासन करते हैं।

मंगल को एक संकटमोचक माना जाता है और यह व्रत उन बुराइयों और समस्याओं को दूर करने के लिए किया जाता है जो हमारे रास्ते को खराब करती हैं और खुशी का रास्ता बनाती हैं। अंतर्निहित मान्यता यह है कि भगवान हनुमान अपने भक्तों को जीवन में कठिनाइयों को दूर करने में मदद करेंगे, विशेष रूप से ‘मंगल ग्रह’ या मंगल के हस्तक्षेप से उत्पन्न। साथ ही पुत्र प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दम्पति भी इस व्रत का पालन कठोरता से करते हैं।

इस लेख में हम Mangalvar Vrat और Mangalvar Vrat Katha (मंगलवार व्रत कथा) के बारे में जानेंगे।

When to do Mangalvar Vrat and Mangalvar Vrat Katha (मंगलवार व्रत और मंगलवार व्रत कथा कब करनी चाहिए)?

एक भक्त चंद्र मास के शुक्ल पक्ष के पहले मंगलवार से मंगलवार व्रत शुरू कर सकता है जब सूर्य उत्तरायण में होता है और उसे इसे 21 सप्ताह तक जारी रखना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि 21 सप्ताह तक लगातार मंगलवार व्रत और Mangalvar Vrat Katha (मंगलवार व्रत कथा) करने से मंगल संबंधी सभी समस्याओं (आमतौर पर शारीरिक, प्राकृतिक और आर्थिक परेशानियों) से छुटकारा मिल जाता है।

Mangalvar Vrat Katha (मंगलवार व्रत कथा) In Hindi

Mangalvar Vrat Katha Vidhi In Hindi (मंगलवार व्रत कथा विधि)

इस व्रत और Mangalvar Vrat Katha (मंगलवार व्रत कथा) को करने से पहले व्यक्ति को एक दिन पहले ही इसके लिये मानसिक रुप से स्वयं को तैयार कर लेना चाहिए। और व्रत वाले दिन उसे सूर्योदय से पहले उठना चाहिए। प्रात: काल में नित्यक्रियाओं से निवृ्त होकर उसे स्नान आदि क्रियाएं कर लेनी चाहिए। उसके बाद पूरे घर में गंगा जल या शुद्ध जल छिडकर उसे शुद्ध कर लेना चाहिए। व्रत वाले दिन व्यक्ति को लाल रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए।

घर की ईशान कोण की दिशा में किसी एकांत स्थान पर हनुमानजी की मूर्ति या चित्र स्थापित करना चाहिए। पूजन स्थान पर चार बत्तियों का दिपक जलाया जाता है और व्रत का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद लाल गंध, पुष्प, अक्षत आदि से विधिवत हनुमानजी की पूजा करनी चाहिए और Mangalvar Vrat Katha (मंगलवार व्रत कथा) करनी चाहिए।

श्री हनुमानजी की पूजा करते समय मंगल देवता के इक्कीस नामों का उच्चारण करना शुभ माना जाता है। मंगलवार के व्रत और Mangalvar Vrat Katha (मंगलवार व्रत कथा) के दिन सात्विक विचार का रहना आवश्यक है।

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Benefits of Mangalvar Vrat and Mangalvar Vrat Katha (मंगलवार व्रत और मंगलवार व्रत कथा के लाभ)

मंगलवर व्रत और Mangalvar Vrat Katha (मंगलवार व्रत कथा) उन जोड़ों द्वारा किया जाता है जो पुत्र की कामना करते हैं। अन्य लाभों में परिवार में खुशी शामिल है। ज्योतिष में विश्वास रखने वाले लोग मंगल या मंगल ग्रह से जुड़े हानिकारक प्रभावों को कम करने के लिए उपवास रखते हैं।

इस व्रत को भूत-प्रेतादि बाधाओं से मुक्ति के लिये भी किया जाता है और व्रत वाले दिन व्रत की कथा अवश्य सुननी चाहिए। इस व्रत वाले दिन कभी भी नमक का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

मंगलवार का व्रत और Mangalvar Vrat Katha (मंगलवार व्रत कथा) भगवान मंगल और पवनपुत्र हनुमानजी को प्रसन्न करने के लिये इस व्रत को किया जाता है। इस व्रत को लगातार 21 मंगलवार तक किया जाता है। इस व्रत को करने से मंगलग्रह की शान्ति होती है।

Mangalvar Vrat Katha (मंगलवार व्रत कथा) In Hindi (1)

एक गॉव में ब्राह्मण और उसकी पत्‍नी रहते थे, उनके कोई सन्‍तान नही होने के कारण दोनो बहुत दुखी रहते थे। वह ब्रह्मण रोज हनुमानजी की पूजा हेतु वन में जाता और पूजा के दौरान पुत्र प्राप्‍ति का वरदान मागंता था। और घर पर उसकी पत्‍नी पुत्र प्राप्‍ति के लिए प्रत्‍येक मंगलवार को व्रत रखती थी। वह हर मंगलवार को पूरे विध‍ि विधान से हनुमानजी का व्रत व पूजा करती और भोजन बनाकर पहले तो हनुमानजी को भोग लगाती और फिर दोनो ग्रहण करते थे। एक बार कोई ऐसा व्रत आ गया जिसके कारण वह भोजन न बना सकी और हनुमानजी को भोग नही लगा पायी।

वह अपने मन में ऐसा प्रण करके सो गई कि अब अगले मंगलवार को हनुमान जी का भोग लगाकर अन्‍न ग्रहण करूगी। वह ब्रह्मणी 6 दिन तक भूखी प्‍यासी रहने के कारण उसे मूर्छा आ गई। तब हनुमानजी उसकी लगन और निष्‍ठावान भक्‍ती को देखकर प्रसन्‍न हो गये। उन्‍होने उसे दर्शन दिया और कहा मै तुमसे अति प्रसन्‍न हूँ। “मै तुम्‍हे एक सुन्‍दर बालक देता हूँ”, जो तेरी बहुत सेवा किया करेगा। हनुमानजी मंगलवार को बाल रूप में दर्शन देकर अन्‍तर्धान हो गए।

वह ब्रह्मणी सुन्‍दर बालक पाकर अति प्रसन्‍न हुई, और उसका नाम मंगल रखा। कुछ दिनो के बाद ब्रह्मण वन से लौटकर आया। तो उसने उस बालक को घर के आगंन में क्रीडा करते देखकर ब्रह्मणी से पूछा “यह बालक कौन है?” तब पत्‍नी ने कहा की हनुमानजी महाराज मगंलवार के व्रत से प्रसन्‍न होकर मुझे वरदान के रूप में यह बालक दिया है। ब्रह्मण अपनी पत्‍नी की बात सुनकर सोचा की यह बात छल से भरी जान उसने सोचा यह कुल्‍टा व्‍याभिचारिणी अपनी कलुषता छुपाने के लिए बात बना रही है।

एक दिन पति कुऍं पर पानी भरने के लिए जार रहा था, तब ब्रह्मणी बाेली की मंगल को भी अपने साथ ले जाओ। वह ब्रह्मण मंगल को अपने साथ ले गया और उसे कुऍ में डालकर स्‍वमं पानी भरकर घर आया, तो पत्‍नी ने पूछा कि मंगल कहा है। तब पीछे देखा तो मंगल मुस्‍कुराता हुआ घर आ रहा था, उसको देखकर ब्रह्मण आश्‍चर्य चकित रह गया। जब रात्रि में ब्रह्मण सोया हुआ था हनुमानजी उसके स्‍वप्‍न में आकर बोले की यह बालकर मैन दिया है। तुम अपनी पत्‍नी को कुल्‍टा और भुरा भला मत कहा।

पति यह जानकर बहुत ही प्रसन्‍न हुआ और वह अपनी पत्‍नी के साथ प्रत्‍येक मंगलवार का व्रत करने लगा। और अपने जीवन को आन्‍नदपूर्वक व्‍यतीत करने लगा।

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Mangalvar Vrat Katha (मंगलवार व्रत कथा) In Hindi (2)

एक बार नैमिषारण्य तीर्थ में अस्सी हजार मुनि एकत्र हो कर पुराणों के ज्ञाता श्री सूत जी से पूछने लगे- हे महामुने! आपने हमें अनेक पुराणों की कथाएं सुनाई हैं, अब कृपा करके हमें ऐसा व्रत और कथा बतायें जिसके करने से सन्तान की प्राप्ति हो तथा मनुष्यों को रोग, शोक, अग्नि, सर्व दुःख आदि का भय दूर हो क्योंकि कलियुग में सभी जीवों की आयु बहुत कम है। फिर इस पर उन्हें रोग-चिन्ता के कष्ट लगे रहेंगे तो फिर वह श्री हरि के चरणों में अपना ध्यान कैसे लगा सकेंगे।

श्री सूत जी बोले- हे मुनियों! आपने लोक कल्याण के लिए बहुत ही उत्तम बात पूछी है। एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से लोक कल्याण के लिए यही प्रश्न किया था। भगवान श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर का संवाद तुम्हारे सामने कहता हूं, ध्यान देकर सुनो।

एक समय पाण्डवों की सभा में श्रीकृष्ण जी बैठे हुए थे। तब युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न किया- हे प्रभो, नन्दनन्द, गोविन्द! आपने मेरे लिए अनेकों कथायें सुनाई हैं, आज आप कृपा करके ऐसा व्रत या कथा सुनायें जिसके करने से मनुष्य को रोग-चिन्ता का भय समाप्त हो और उसको पुत्र की प्राप्ति हो, हे प्रभो, बिना पुत्र के जीवन व्यर्थ है, पुत्र के बिना मनुष्य नरकगामी होता है, पुत्र के बिना मनुष्य पितृ-ऋण से छुटकारा नहीं पा सकता और न ही उसका पुन्नग नामक नरक से उद्धार हो सकता है। अतः पुत्र दायक व्रत बतलाएं।

श्रीकृष्ण भगवान बोले- हे राजन्‌ ! मैं एक प्राचीन इतिहास सुनाता हूं, आप उसे ध्यानपूर्वक सुनो।

कुण्डलपुर नामक एक नगर था, उसमें नन्दा नामक एक ब्राह्‌मण रहता था। भगवान की कृपा से उसके पास सब कुछ था, फिर भी वह दुःखी था। इसका कारण यह था कि ब्राह्‌मण की स्त्री सुनन्दा के कोई सन्तान न थी। सुनन्दा पतिव्रता थी। भक्तिपूर्वक श्री हनुमान जी की आराधना करती थी। मंगलवार के दिन व्रत करके अन्त में भोजन बना कर हनुमान जी का भोग लगाने के बाद स्वयं भोजन करती थी। एक बार मंगलवार के दिन ब्राह्‌मणी गृह कार्य की अधिकता के कारण हनुमान जी को भोग न लगा सकी, तो इस पर उसे बहुत दुःख हुआ। उसने कुछ भी नहीं खाया और अपने मन में प्रण किया कि अब तो अगले मंगलवार को ही हनुमान जी का भोग लगाकर अन्न-जल ग्रहण करूंगी।

ब्राह्‌मणी सुनन्दा प्रतिदिन भोजन बनाती, श्रद्धापूर्वक पति को खिलाती, परन्तु स्वयं भोजन नहीं करती और मन ही मन श्री हनुमान जी की आराधना करती थी। इसी प्रकार छः दिन गुजर गए, और ब्राह्‌मणी सुनन्दा अपने निश्चय के अनुसार भूखी प्यासी निराहार रही, अगले मंगलवार को ब्राह्‌मणी सुनन्दा प्रातः काल ही बेहोश होकर गिर पड़ी।

ब्राह्‌मणी सुनन्दा की इस असीम भक्ति के प्रभाव से श्री हनुमान जी बहुत प्रसन्न हुए और प्रकट होकर बोले- सुनन्दा ! मैं तेरी भक्ति से बहुत प्रसन्न हूं, तू उठ और वर मांग।

सुनन्दा अपने आराध्य देव श्री हनुमान जी को देखकर आनन्द की अधिकता से विह्‌वल हो श्री हनुमान जी के चरणों में गिरकर बोली- ‘हे प्रभु, मेरी कोई सन्तान नहीं है, कृपा करके मुझे सन्तान प्राप्ति का आशीर्वाद दें, आपकी अति कृपा होगी।’

श्री महावीर जी बोले -‘तेरी इच्छा पूर्ण होगी। तेरे एक कन्या पैदा होगी उसके अष्टांग प्रतिदिन सोना दिया करेंगे।’ इस प्रकार कह कर श्री महावीर जी अन्तर्ध्यान हो गये। ब्राह्‌मणी सुनन्दा बहुत हर्षित हुई और सभी समाचार अपने पति से कहा, ब्राह्‌मण देव कन्या का वरदान सुनकर कुछ दुःखी हुए, परन्तु सोना मिलने की बात सुनी तो बहुत प्रसन्न हुए। विचार किया कि ऐसी कन्या के साथ मेरी निर्धनता भी समाप्त हो जाएगी।

श्री हनुमान जी की कृपा से वह ब्राह्‌मणी गर्भवती हुई और दसवें महीने में उसे बहुत ही सुन्दर पुत्री प्राप्त हुई। यह बच्ची, अपने पिता के घर में ठीक उसी तरह से बढ़ने लगी, जिस प्रकार शुक्लपक्ष का चन्द्रमा बढ ता है। दसवें दिन ब्राह्‌मण ने उस बालिका का नामकरण संस्कार कराया, उसके कुल पुरोहित ने उस बालिका का नाम रत्नावली रखा, क्योंकि यह कन्या सोना प्रदान किया करती थी, इस कन्या ने पूर्व-जन्म में बड़े ही विधान से मंगलदेव का व्रत किया था।

रत्नावली का अष्टांग बहुत सा सोना देता था, उस सोने से नन्दा ब्राह्‌मण बहुत ही धनवान हो गय। अब ब्राह्‌मणी भी बहुत अभिमान करने लगी थी। समय बीतता रहा, अब रत्नावली दस वर्ष की हो चुकी थी। एक दिन जब नन्दा ब्राह्‌मण प्रसन्न चित्त था, तब सुनन्दा ने अपने पति से कहा- ‘मेरी पुत्री रत्नावली विवाह के योग्य हो गयी है, अतः आप कोई सुन्दर तथा योग्य वर देखकर इसका विवाह कर दें।’ यह सुन ब्राह्‌मण बोला- ‘अभी तो रत्नावली बहुत छोटी है’ ।

तब ब्राह्‌मणी बोली- ‘शास्त्रों की आज्ञा है कि कन्या आठवें वर्ष में गौरी, नौ वर्ष में राहिणी, दसवें वर्ष में कन्या इसके पश्चात रजस्वला हो जाती है। गौरी के दान से पाताल लोक की प्राप्ति होती है, राहिणी के दान से बैकुण्ठ लोक की प्राप्ति होती है, कन्या के दान से इन्द्रलोक में सुखों की प्राप्ति होती है। अगर हे पतिदेव! रजस्वला का दान किया जाता है तो घोर नर्क की प्राप्ति होती है।’

इस पर ब्राह्‌मण बोला -‘अभी तो रत्नावली मात्र दस ही वर्ष की है और मैंने तो सोलह-सोलह साल की कन्याओं के विवाह कराये हैं अभी जल्दी क्या है।’ तब ब्राह्‌मणी सुनन्दा बोली- ‘ आपको तो लोभ अधिक हो गया लगता है। शास्त्रों में कहा गया है कि माता-पिता और बड़ा भाई रजस्वला कन्या को देखते हैं तो वह अवश्य ही नरकगामी होते हैं।’

तब ब्राह्‌मण बोला-‘अच्छी बात है, कल मैं अवश्य ही योग्य वर की तलाश में अपना दूत भेजूंगा।’ दूसरे दिन ब्राह्‌मण ने अपने दूत को बुलाया और आज्ञा दी कि जैसी सुन्दर मेरी कन्या है वैसा ही सुन्दर वर उसके लिए तलाश करो। दूत अपने स्वामी की आज्ञा पाकर निकल पड़ा। पम्पई नगर में उसने एक सुन्दर लड के को देखा। यह बालक एक ब्राह्‌मण परिवार का बहुत गुणवान पुत्र था, इसका नाम सोमेश्वर था। दूत ने इस सुन्दर व गुणवान ब्राह्‌मण पुत्र के बारे में अपने स्वामी को पूर्ण विवरण दिया। ब्राह्‌मण नन्दा को भी सोमेश्वर अच्छा लगा और फिर शुभ मुहूर्त में विधिपूर्वक कन्या दान करके ब्राह्‌मण-ब्राह्‌मणी संतुष्ट हुए।

परन्तु! ब्राह्‌मण के मन तो लोभ समाया हुआ था। उसने कन्यादान तो कर दिया था पर वह बहुत खिन्न भी था। उसने विचार किया कि रत्नावली तो अब चली जावेगी, और मुझे इससे जो सोना मिलता था, वह अब मिलेगा नहीं। मेरे पास जो धन था कुछ तो इसके विवाह में खर्च हो गया और जो शेष बचा है वह भी कुछ दिनों पश्चात समाप्त हो जाएगा। मैंने तो इसका विवाह करके बहुत बड़ी भूल कर दी है। अब कोई ऐसा उपाय हो कि रत्नावली मेरे घर में ही बनी रहे, अपनी ससुराल ना जावे।

लोभ रूपी राक्षस ब्राह्‌मण के मस्तिष्क पर छाता जा रहा था। रात भर अपनी शैय्‌या पर बेचैनी से करवटें बदलते-बदलते उसने एक बहुत ही क्रूर निर्णय लिया। उसने विचार किया कि जब रत्नावली को लेकर उसका पति सोमेश्वर अपने घर के लिए जाएगा तो वह मार्ग में छिप कर सोमेश्वर का वध कर देगा और अपनी लड की को अपने घर ले आवेगा, जिससे नियमित रूप से उसे सोना भी मिलता रहेगा और समाज का कोई मनुष्य उसे दोष भी नहीं दे सकेगा।

प्रातःकाल हुआ तो, नन्दा और सुनन्दा ने अपने जमाई तथा लड की को बहुत सारा धन देकर विदा किया। सोमेश्वर अपनी पत्नी रत्नावली को लेकर ससुराल से अपने घर की तरफ चल दिया।

ब्राह्‌मण नन्दा महालोभ के वशीभूत हो अपनी मति खो चुका था। पाप-पुण्य को उसे विचार न रहा था। अपने भयानक व क्रूर निर्णय को कार्यरूप देने के लिए उसने अपने दूत को मार्ग में अपने जमाई का वध करने के लिए भेज दिया था ताकि रत्नावली से प्राप्त होने वाला सोना उसे हमेशा मिलता रहे और वो कभी निर्धन न हों ब्राह्‌मण के दूत ने अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करते हुए उसके जमाई सोमेश्वर का मार्ग में ही वध कर दिया। समाचार प्राप्त कर ब्राह्‌मण नन्दा मार्ग में पहुंचा और रुदन करती अपनी पुत्री रत्नावली से बोला-‘हे पुत्री! मार्ग में लुटेरों ने तेरे पति का वध कर दिया है। भगवान की इच्छा के आगे किसी का कोई वश नहीं चलता है। अब तू घर चल, वहां पर ही रहकर शेष जीवन व्यतीत करना। जो भाग्य में लिखा है वही होगा।’

अपने पति की अकाल मृत्यु से रत्नावली बहुत दुःखी हुई। करुण क्रन्दन व रुदन करते हुए अपने पिता से बोली- ‘हे पिताजी! इस संसार में जिस स्त्री का पति नहीं है उसका जीना व्यर्थ है, मैं अपने पति के साथ ही अपने शरीर को जला दूंगी और सती होकर अपने इस जन्म को, माता-पिता के नाम को तथा सास-ससुर के यश को सार्थक करूंगी।’

ब्राह्‌मण नन्दा अपनी पुत्री रत्नावली के वचनों को सुनकर बहुत दुःखी हुआ। विचार करने लगा- मैंने व्यर्थ ही जमाई वध का पाप अपने सिर लिया। रत्नावली तो उसके पीछे अपने प्राण तक देने को तैयार है। मेरा तो दोनों तरफ से मरण हो गया। धन तो अब मिलेगा नहीं, जमाई वध के पाप के फलस्वरूप यम यातना भी भुगतनी पड़ेगी। यह सोचकर वह बहुत खिन्न हुआ।

सोमेश्वर की चिता बनाई गई। रत्नावली सती होने की इच्छा से अपने पति का सिर अपनी गोद में रखकर चिता में बैठ गई। जैसे ही सोमेश्वर की चिता को अग्नि लगाई गई वैसे ही प्रसन्न हो मंगलदेव वहां प्रकट हुए और बोले-‘हे रत्नावली! मैं तेरी पति भक्ति से बहुत प्रसन्न हूं, तू वर मांग।’ रत्नावली ने अपने पति का जीवनदान मांगा। तब मंगल देव बोले-‘रत्नावली! तेरा पति अजर-अमर है। यह महाविद्वान भी होगा। और इसके अतिरिक्त तेरी जो इच्छा हो वर मांग।’

तब रत्नावली बोली- ‘हे ग्रहों के स्वामी! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे यह वरदान दीजिए कि जो भी मनुष्य मंगलवार के दिन प्रातः काल लाल पुष्प, लाल चन्दन से पूजा करके आपका स्मरण करे उसको रोग-व्याधि न हो, स्वजनों का कभी वियोग न हो, सर्प, अग्नि तथा शत्रुओं का भय न रहे, जो स्त्री मंगलवार का व्रत करे, वह कभी विधवा न हो।”

मंगलदेव -‘तथास्तु’ कह कर अन्तर्ध्यान हो गये।

सोमेश्वर मंगलदेव की कृपा से जीवित हो उठा। रत्नावली अपने पति को पुनः प्राप्त कर बहुत प्रसन्न हुई और मंगल देव का व्रत प्रत्येक मंगलवार को करके व्रतराज और मंगलदेव की कृपा से इस लोक में सुख-ऐश्वर्य को भोगते हुए अन्त में अपने पति के साथ स्वर्ग लोक को गई।

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