महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी


महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी

महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) का त्योहार हिन्दू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। महाशिवरात्रि का त्योहार “देवों के देव” कहे जाने वाले “महादेव” भगवान शिव जी के लिए समर्पित है।

महाशिवरात्रि का दिन सम्पूर्ण भारत वर्ष के साथ-साथ पूरे विश्व के हिन्दू श्रद्धालुओं द्वारा बड़े हर्षोल्लास व भक्ति के साथ मनाया जाता है। इस दिन हिन्दू धर्म को मानने वाले श्रद्धालु भगवान शिव जी की भक्ति करते हैं।

कई भक्त महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के दिन व्रत का पालन भी करते हैं तथा रात भर भजन-कीर्तन करते हैं। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार यह पवित्र दिन फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन मनाया जाता है।

हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार इसी दिन सृष्टि का उदय हुआ था। मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान शिव के दिव्य तथा विशालकाय रूप “अग्निलिंग” से सृष्टि का आरम्भ हुआ था।

ऐसी भी मान्यता है कि महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के दिन ही भगवान शिव जी तथा माँ पार्वती का विवाह हुआ था। सम्पूर्ण वर्ष में कुल 12 शिवरात्रियाँ होती हैं जिनमें से “महाशिवरात्रि” सबसे प्रमुख है।

कश्मीर में रहने वाले शैव मत के अनुयायी इस दिन को “हर रात्रि” या “हेरथ” कहते हैं और इस दिन को बहुत उत्साह के साथ मनाते हैं। इसी तरह यह दिन उत्तर तथा दक्षिण भारत में बड़ी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है।

इस लेख में हम महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी प्राप्त करेंगे और साथ ही जानेंगे महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) से जुड़े अन्य तथ्यों के बारे में।

महाशिवरात्रि क्या है? (What Is Maha Shivratri?)

शिवरात्रि (Shivratri) का अर्थ है “शिव की रात्रि“। जैसा कि नाम से स्पष्ट है यह रात्रि भगवान शिव जी को समर्पित है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार हर एक माह में एक शिवरात्रि होती है।

हिन्दू कैलेंडर के प्रत्येक माह में अमावस्या से एक दिन पहले का दिन शिवरात्रि का दिन होता है। परंतु फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को “महाशिवरात्रि” का त्योहार मनाया जाता है।

ज़्यादातर हिन्दू त्योहार दिन में मनाये जाते हैं परंतु शिवरात्रि का त्योहार रात को मनाया जाने वाला त्योहार है। हिन्दू धर्म में शैव समुदाय के श्रद्धालुओं द्वारा यह दिन अति महत्वपूर्ण माना जाता है।

महाशिवरात्रि का पर्व क्यों मनाया जाता है? (Why is the festival of Maha Shivratri celebrated?)

अगर हम वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो इस रात को पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध की स्थिति इस प्रकार होती है कि मनुष्य में ऊर्जा का प्राकृतिक अभ्युत्थान होता है।

इस दिन प्रकृति अपनी दैवीय शक्ति से मनुष्य को उसके आध्यात्मिक शिखर की ओर ले जाती है। इसलिए इस दिन महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) का महोत्सव मना कर के अपनी आध्यात्मिक शक्ति को ऊर्जावान करने के लिए श्रद्धालु ध्यान भी करते हैं।

परंतु इसके साथ ही महाशिवरात्रि से जुड़ी हुई कुछ विशेष मान्यताएं भी हैं जिनकी वजह से यह महत्वपूर्ण त्योहार मनाया जाता है।

महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) से जुड़ी निम्नलिखित मान्यताएं हैं:

  • ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव जी तथा माता पार्वती का विवाह हुआ था इसलिए महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) का महोत्सव हिन्दू धर्म में मानने वाले श्रद्धालुओं द्वारा मनाया जाता है।
  • समुद्रमंथन के समय जब विष प्रकट हुआ था तो देवताओं और राक्षसों में से किसी ने भी विष को स्वीकार नहीं किया। तब भगवान शिव ने संसार के उद्धार के लिए विष को पीकर अपने कंठ पर रोक लिया। विष की वजह से शिव जी का कंठ नीला पड़ गया। इसलिए भगवान शिव जी को नीलकंठ भी कहा जाता है। संसार का उद्धार करने के लिए भी भगवान शिव जी के सम्मान में महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) का दिन मनाया जाता है।
  • एक और मान्यता के अनुसार जब गंगा माँ को पृथ्वी पर स्वर्ग से अवतरित होना था तो उनके असहनीय वेग से पृथ्वी को बचाने के लिए भगवान शिव जी ने अपनी जटाओं को आगे कर दिया और माँ गंगा का वेग भगवान शिव जी की जटाओं में उलझने के कारण कम हुआ। फिर गंगा माँ जटाओं से होते हुए पृथ्वी पर पहुंचीं। इसलिए भी महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) का दिन मनाया जाता है और शिवलिंग पर जल अर्पित किया जाता है।
महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी

महाशिवरात्रि की कथा क्या है? (What is the story of Maha Shivratri?)

महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के दिन हिन्दू श्रद्धालु व्रत का भी पालन करते हैं। व्रत का पालन विधि अनुसार करना चाहिए। इस दिन भगवान शिव जी की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। महाशिवरात्रि की पूजा विधि हमने इसी लेख में नीचे दी हुई है। आप उसे इसी लेख में पढ़ सकते हैं।

महाशिवरात्रि व्रत कथा (Maha Shivratri Vrat Katha)

प्राचीन काल की बात है एक चित्रभानु नाम का शिकारी था। वह अपने परिवार का पालन पोषण पशुओं की हत्या करके करता था।

एक साहूकार से उसने ऋण लिया हुआ था परन्तु वह ऋण को समय पर चुका पाने में असमर्थ था। इस कारण साहूकार ने उसे क्रोधित होकर अपने पुराने घर में बंदी बना दिया।

इस घर के साथ ही एक शिवमठ भी था। जिस दिन उसे बंदी बनाकर रखा गया था उस दिन संयोग से शिवरात्रि (Shivratri) का दिन था। शिवमठ में उस दिन भगवान शिव जी की महिमा का वर्णन किया जा रहा था तथा शिवरात्रि व्रत कथा का भी पाठ हुआ।

शिकारी ने बंदी रहते हुए भगवान शिव की महिमा सुनी तथा शिवरात्रि व्रत कथा को भी सुना। संध्याकाल जब हुआ तो साहूकार ने शिकारी को फिर से अपने पास बुलाया और उससे ऋण चुकाने के लिए कहा।

साहूकार के ऋण चुकाने की बात पर शिकारी ने उसे आश्वासन दिया कि वह अगले दिन सारा का सारा ऋण चुका देगा। साहूकार ने शिकारी की बात को मानते हुए उसे छोड़ दिया और ऋण को अगले दिन तक चुकाने तक का समय उसे दिया।

इसके बाद शिकारी जंगल में शिकार करने के लिए गया। वह दिन भर बंदी रहने के कारण भूख-प्यास से त्रस्त था और बहुत ही व्याकुल था।

सूर्यास्त होने वाला था। जंगल में शिकार की तलाश में वह एक जलाशय के पास पहुंचा। जलाशय के पास एक पेड़ था। शिकारी उस पेड़ पर चढ़ गया।

शिकारी उस पेड़ पर इसलिए चढ़ा क्यूंकि उसको यह आस थी कि सूर्यास्त के समय कोई न कोई जानवर पानी पीने ज़रूर आएगा और वह मौका देख कर उसका शिकार कर लेगा।

जिस पेड़ पर शिकारी चढ़ा था वह बेलपत्र का पेड़ था तथा उस पेड़ के निचे एक शिवलिंग भी था। सूखे हुए बेलपत्र शिवलिंग के ऊपर पड़े होने के कारण वह शिवलिंग उनसे ढक गया था और दिखाई नहीं दे रहा था।

पेड़ पर चढ़ते समय कुछ बेलपत्र संयोग से शिवलिंग के ऊपर गिर गए। इस प्रकार अनजाने में शिकारी का महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) का व्रत पूर्ण हो गया।

रात्रि का एक पहर बीत जाने पर एक गर्भ धारण किये हुए हिरणी पानी पीने जलाशय पर पहुंची। शिकारी ने अपने धनुष पर तीर को चढ़ा कर जैसे ही प्रत्यंचा को खींचा तो उसकी बाजू के स्पर्श से कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर जाकर गिर गए।

बेलपत्रों पर रात्रि की ओस जमा होने के कारण शिवलिंग पर बेलपत्र तथा जल दोनों ही अर्पित हो गए और इस प्रकार शिकारी की पहले प्रहर की भगवान शिव जी की पूजा भी अनजाने में हो गयी।

तभी हिरणी की नज़र शिकारी पर पड़ी और वह तुरंत वहां से भागकर झाड़ियों में विलुप्त हो गयी। यह देखकर शिकारी को बहुत दुःख हुआ और वह फिर से शिकार के आने की प्रतीक्षा करने लगा।

कुछ देर बाद रात्रि के दूसरे प्रहर में एक और हिरणी वहां पर पानी पीने आयी और शिकारी ने तत्काल ही अपने धनुष पर बाण चढ़ाया। बाण चढ़ाते समय शिकारी की हलचल से कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर जाकर गिर गए।

इस प्रकार अनजाने में फिर से शिकारी द्वारा भगवान शिव जी की दूसरे प्रहर में पूजा-अर्चना हो गयी। परन्तु इस बार फिर से हिरणी भागने में सक्षम रही और शिकारी हिरणी का शिकार नहीं कर पाया।

दो बार अपने शिकार को खोकर शिकारी चिंता में पड़ गया। रात्रि का अंतिम प्रहर बीतने को आया था और तभी एक और हिरणी अपने बच्चों सहित जलाशय पर पानी पीने आयी।

शिकार को देखकर शिकारी ने फिर से धनुष पर बाण को चढ़ाया। जैसे ही शिकारी निशाना लगाने वाला था उसे हिरणी के बच्चों को देख कर अपने बच्चों की याद आ गयी।

दयावश शिकारी द्वारा बाण नहीं चलाया गया। यह शिकारी के साथ पहली बार हुआ था कि दयावश वह बाण नहीं चला पाया था। यह भगवान शिव जी की पूजा-अर्चना का ही असर था।

शिकारी यह नहीं समझ पा रहा था कि उसके अंदर यह दयाभाव कैसे उत्पन्न हुआ। इस बार भी शिकारी शिकार नहीं कर पाया था और हिरणी अपने बच्चों के साथ पानी पीकर वहां से चली गयी थी।

शिकारी फिर से शिकार की प्रतीक्षा करने लग गया और इस बार उसने ठान ली कि इस बार वह ज़रूर शिकार करेगा। शिकार की प्रतीक्षा में शिकारी बेलपत्र पेड़ से तोड़ता और नीचे गिराता जाता। इस प्रकार वह बेलपत्र शिवलिंग पर अर्पित हो जाते।

इस प्रकार अनजाने में शिकारी से भगवान शिव जी की तीसरे एवं अंतिम प्रहर की भी पूजा हो गयी। शिकारी शिकार की प्रतीक्षा कर रहा था कि तभी वहां पर एक हिरण अपनी हिरणी तथा बच्चों के साथ पानी पीने आया।

इस बार जैसे ही शिकारी ने धनुष पर बाण चढ़ाया तो उसके अंतर्मन से यह पाप न करने की आवाज़ आई। व्रत, रात्रि जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र और जल के चढ़ने से शिकारी का ह्रदय निर्मल एवं शुद्ध हो चुका था।

उसमें दया भाव उत्पन्न हो चुका था और उसमें भगवान की भक्ति की ऊर्जा का वास हो चुका था। दयावश उसने हिरण को उसके बच्चों तथा हिरणी के साथ वहाँ से जाने दिया।

शिकारी को अपने जीवन में की गयी पशु हत्याओं पर बहुत आत्मग्लानि हुई और वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। शिकारी का हृदय अब कोमल हो चुका था।

भगवान शिव जी ने प्रसन्न हो कर शिकारी को दिव्य दर्शन दिए और शिकारी को सुख समृद्धि का वरदान प्रदान किया। भगवान शिव जी की कृपा दृष्टि से शिकारी धन-धान्य से समृद्ध हो गया और उसने साहूकार का ऋण चुका दिया।

अब शिकारी अपने गाँव में व्यवसाय करने लगा और अपने परिवार के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा।

बोलो हर-हर महादेव!

महाशिवरात्रि कब है? (On which day is Maha Shivratri?)

अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) इस वर्ष 1 मार्च, 2022 के दिन है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) का दिन फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन मनाया जाएगा।

हिन्दू धर्म को मानने वाले श्रद्धालु महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के दिन भगवान शिव जी के लिए समर्पित व्रत रखते हैं और उनकी पूजा करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन जो व्यक्ति व्रत रखता है उसे पुण्य की प्राप्ति होती है और जीवन में सुख समृद्धि मिलती है।

महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी

महाशिवरात्रि की पूजा विधि क्या है? (What is the Puja Vidhi of Maha Shivratri?)

महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) की पूजा विधि इस प्रकार है:

  • इस दिन को विशेष रूप से स्वच्छता एवं सात्विकता का ध्यान रखना चाहिए।
  • महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के दिन प्रातः काल उठकर स्नान करना चाहिए और व्रत का संकल्प करना चाहिए।
  • भगवान शिव जी की मूर्ती तथा शिवलिंग के सामने धूप तथा दीपक जलाएं और भगवान को फूल अर्पित करें।
  • इस बात का ध्यान रखें कि भगवान शिव जी को केतकी के फूल अर्पित नहीं किये जाते।
  • पूजा के समय चन्दन का टीका मस्तिष्क पर लगाएं।
  • महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।
  • भगवान को भोग लगाएं।
  • पूरे दिन व्रत का पालन करें तथा फलाहार ही ग्रहण करें।
  • संध्याकाल में शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग का गंगाजल से जलाभिषेक करें और बेलपत्र को शिवलिंग पर अर्पित करें। भगवान शिव को बेलपत्र अति प्रिय हैं। शिवलिंग पर 3 या 5 बेलपत्र चढ़ाएं।
  • फिर भगवान शिव जी की महाशिवरात्रि व्रत कथा (Maha Shivratri Vrat Katha) का पाठ करें और भगवान शिव जी की आरती (Shiv Aarti) करें। महाशिवरात्रि व्रत कथा (Maha Shivratri Vrat Katha) हमने इस लेख में ऊपर दी हुई है। आप महाशिवरात्रि व्रत कथा (Maha Shivratri Vrat Katha) वहाँ से पढ़ सकते हैं। भगवान शिव जी की आरती पढ़ने के लिए निचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

    भगवान शिव जी की आरती (Shiv Aarti)
  • भगवान शिव जी को प्रसाद चढ़ाएं और प्रसाद चढ़ाने के बाद बाकी लोगों में भी प्रसाद बांटें।
  • अगले दिन प्रातः काल को ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा कर के व्रत का पारण करें।

महाशिवरात्रि का धार्मिक महत्त्व क्या है? (What is the religious significance of Maha Shivratri?)

भगवान शिव जी की हिन्दू धर्म में बहुत प्रतिष्ठा है। भगवान शिव जी त्रिदेवों में प्रमुख हैं और उन्हें महादेव का दर्जा प्राप्त है। महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के दिन भगवान शिव जी की पूजा और व्रत रखने का हिन्दू धर्म में विशेष महत्त्व है।

हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान शिव ने शिवलिंग के स्वरूप में अपने को प्रकट किया था। एक अन्य मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था।

महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) पर अविवाहित कन्याएं पूरे दिन व्रत का पालन करते हुए भगवान शिव जी की आराधना करती हैं और शिव जी से योग्य वर की प्राप्ति के लिए कामना करती हैं।

महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के दिन मंदिर में शिवलिंग पर जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करने से सभी तरह के सुख और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

महाशिवरात्रि का दिन हिन्दुओं के लिया इतना महत्वपूर्ण है कि सुबह से ही शिव मंदिरों में शिव भक्तों की भीड़ जुटना प्रारंभ हो जाती है।

निष्कर्ष

तो इस लेख में हमने महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त की और साथ में महाशिवरात्रि से जुड़े अन्य तथ्यों के बारे में भी जाना।

इस लेख में हमने महाशिवरात्रि व्रत (Maha Shivratri Vrat), महाशिवरात्रि व्रत कथा (Maha Shivratri Vrat Katha) और महाशिवरात्रि पूजा विधि (Maha Shivratri Puja Vidhi) के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त की।

हम आशा करते हैं कि आपको महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के विषय पर हमारा यह लेख अच्छा लगा होगा और आपके ज्ञान में ज़रूर कुछ न कुछ वृद्धि हुई होगी। कृपया इस लेख को दूसरों के साथ भी साँझा करें।

खुश रहें, स्वस्थ रहें…

जय श्री कृष्ण!

महाशिवरात्रि (Maha Shivratri) के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी – PDF Download


onehindudharma.org

इस महत्वपूर्ण लेख को भी पढ़ें - मोक्षदा एकादशी व्रत कथा (Mokshada Ekadashi Vrat Katha In Hindi)

Leave a Comment

आज का पंचांग जानने के लिए यहाँ पर क्लिक करें। 👉

X
You cannot copy content of this page