Maa Kali Vrat Katha In Hindi (माँ काली व्रत कथा)


Maa Kali Vrat Katha In Hindi (माँ काली व्रत कथा)

जब भी हम मां काली के बारे में सोचते हैं तो हमारे दिमाग में एक तस्वीर उभर आती है जो भयंकर और हिंसक होती है। देवी काली की छवि में भगवान शिव की छाती पर उनके पैर को रेक हुए दिखाया गया है। कटे हुए सिर और हाथों की माला पहने, एक हाथ में तलवार और दूसरे में कटा हुआ सिर और लाल जीभ लटकी हुई है। देवी काली की आंखें क्रोध से उग्र हैं।

वह उग्र रूप में देवी पार्वती का अवतार हैं जिन्हें नारी शक्ति और साहस के रूप में स्वीकार किया जाता है यानी उन्हें नारी शक्ति का प्रतिनिधित्व करने वाली देवी कहना गलत क्यों नहीं होगा।

देवी काली का नाम संस्कृत के एक शब्द काल से लिया गया है जिसका अर्थ है समय इसलिए उन्हें शाश्वत के रूप में देखा जाता है। हालाँकि, उनका रूप आक्रामक और डरावना है लेकिन भक्तों के लिए, वह एक प्यार करने वाली और देखभाल करने वाली माँ हैं जो अपने बच्चे की रक्षा के लिए हमेशा मौजूद रहती हैं।

देवी काली अखंडता के लिए लड़ती हैं और सभी राक्षसों का नाश करती हैं। उन्होंने प्रचलित रूप से श्यामा, कालिका, काल नाशिनी, चामुंडा, भद्र काली, श्यामा काली, आद्या मां, तारा मां और कई अन्य नामों से पुकारा है।

नवरात्रि में काली की पूजा की जाती है और इसका एक महत्वपूर्ण पूजा दिवस होता है यानी दिवाली काली पूजा, श्यामा पूजा या तांत्रिक काली पूजा जो हिंदू कैलेंडर (पंचांग) के अनुसार अक्टूबर या नवंबर में कार्तिक महीने के दिवाली के दिनों में आती है। यह उत्तर-पूर्वी राज्यों विशेषकर पश्चिम बंगाल का प्रसिद्ध त्योहार है।

माँ काली की पूजा कोई भी कर सकता है लेकिन अगर आप माँ काली की पूजा तंत्र विधि से करना चाहते हैं तो कृपया किसी योग्य गुरु के निर्देश में करें।

इस लेख में हम माँ काली व्रत और Maa Kali Vrat Katha (माँ काली व्रत कथा) के बारे में जानेंगे।

When to do Maa Kali Vrat and Maa Kali Vrat Katha (माँ काली व्रत और माँ काली व्रत कथा कब करनी चाहिए)?

काली पूजा जिसे श्यामा पूजा के रूप में भी जाना जाता है, हिंदू कैलेंडर के अनुसार, कार्तिक महीने की अमावस्या के दिन को की जाती है। इसी दिन माँ काली व्रत और Maa Kali Vrat Katha (माँ काली व्रत कथा) करनी चाहिए।

शनिवार का दिन माँ काली का दिन माना जाता है।

Maa Kali Vrat Katha Vidhi In Hindi (माँ काली व्रत कथा विधि)

काली पूजा के लिए आपको जो व्रत रखना है, उसके बहुत कड़े नियम हैं। वास्तविक पूजा से एक दिन पहले, आपको ‘संयम’ या ‘तपस्या’ का अभ्यास करना होगा। फिर आपको सूर्योदय से पूजा समाप्त होने तक उपवास रखना चाहिए। पूजा के समय Maa Kali Vrat Katha (माँ काली व्रत कथा) और माँ काली की आरती ज़रूर करनी चाहिए। आपको कोई भी मांसाहारी या मसालेदार भोजन नहीं करना चाहिए। आप जो खाना खाते हैं वह हल्का होना चाहिए।

काली माता को जो भोजन दिया जाता है उसे भोग कहते हैं। इस भोग को अत्यंत सावधानी से तैयार करना होता है। भोग पकाने वाले व्यक्ति को मौन व्रत रखना चाहिए ताकि उसके मुंह से थूक की एक बूंद भी भोग में न गिरे। पूजा के दौरान मां काली को मांस और मछली का भोग लगाया जाता है। इन मांसाहारी खाद्य पदार्थों को बिना प्याज और लहसुन के पकाया जाना चाहिए।

मां काली पूजा की सिद्धि के लिए बलि का होना अनिवार्य है। कद्दू और लौकी जैसी सब्जियों की बलि प्रतीकात्मक रूप से दी जाती है। काली पूजा अमावस्या की रात को की जाती है। इसे दिन के उजाले में कभी नहीं किया जा सकता है।

इनके अलावा घर में मां काली की पूजा करते समय और भी कई नियमों का पालन करना होता है। इनमें से किसी भी नियम को तोड़ा नहीं जा सकता। और एक बार जब आप काली पूजा करना शुरू कर देते हैं, तो इसे कम से कम 3 साल तक जारी रखना चाहिए।

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Maa Kali Vrat Katha In Hindi (माँ काली व्रत कथा)

Benefits of Maa Kali Vrat and Maa Kali Vrat Katha (माँ काली व्रत और माँ काली व्रत कथा के लाभ)

देवी काली हमें याद दिलाती हैं कि अच्छी बुरी परिस्थितियों से भी निकल सकती है। उनकी पूजा करके आप अपने सपनों और आकांक्षाओं को प्राप्त कर सकते हैं। जहां दुख है वहां खुशियां लाती है। जहां मन में डर होता है, वह व्यक्ति में साहस लाती है। वह हमारे जीवन से अंधकार को दूर करती है।

माँ काली व्रत और Maa Kali Vrat Katha (माँ काली व्रत कथा) के कुछ और लाभ निम्नलिखित हैं:

  • यह आपको साहस और आंतरिक शक्ति देता है और आपको अपनी समस्याओं का सामना करने और हल करने के लिए पर्याप्त मजबूत बनाता है।
  • यह आपके घर में सुख शांति बनाए रखने में मदद करता है।
  • यह आपके और आपके जीवनसाथी के बीच के बंधन को मजबूत करेगा और आपको मजबूत भी बनाएगा ताकि आप किसी भी स्थिति और परिस्थितियों को जल्दी से संभाल सकें।
  • यह आपके जीवन को और अधिक सकारात्मकता के साथ आनंदित करता है और आप में एक सकारात्मक प्रकृति का अनुभव होता है।
  • महाकाली की पूजा, व्रत और Maa Kali Vrat Katha (माँ काली व्रत कथा) सफलता और खुशी की कुंजी हैं, आप आसानी से अपने लक्ष्य को छू सकते हैं और जीवन में अपने लक्ष्य को पूरा कर सकते हैं।
  • अगर आप ऑफिस की राजनीति से परेशान हैं, या किसी तरह की आर्थिक तंगी से परेशान हैं तो यह पूजा और व्रत करना जादू की तरह काम करेगा.
  • यह आपके हर विकार को दूर करेगा और आपके जीवन को सुगम और सुखद बना देगा।

Maa Kali Vrat Katha In Hindi (माँ काली व्रत कथा) 1

प्राचीन काल की बात है,सम्पूर्ण सृष्टी के जलमगन होने के बाद भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में लीन थे। तभी उसी समय अचानक, भगवान विष्णु के कान से मधु और कैटभ नाम के दो पराक्रमी असुर उत्पन्न हुए। यह दोनों असुर भगवान विष्णु की नाभि से उत्पन्न हुए कमल के फूल के ऊपर विराजमान ब्रह्मा जी को मारने का प्रयास करने लगे। जब ब्रह्माजी ने देखा कि दोनों असुर उन पर आक्रमण कर रहें हैं, तब उन्होंने अपनी रक्षा के लिये आदिशक्ति की स्तुति की और उनसे मदद मांगी।

उन दोनों असुरों के वध हेतु माँ आदिशक्ति,फाल्गुन शुक्ला की द्वादशी को माँ महाकाली के रूप में अवतरित हुई। उसी पल भगवान विष्णु भी योगनिद्रा से उठ गये और अपने समक्ष मधु और कैटभ नाम के असुरों को देखते हैं, तो वे दोनों असुरों के साथ युद्ध करनें लगतें है। पाँच हज़ार वर्षों तक, यह घन-घोर युद्ध चलता रहता है। परंतु भगवान उन्हें परास्त करने में असफल हुयें क्यों की दोनों असुरों को माँ आदिशक्ति ने पहले से ही इच्छा मृत्यु का वर दिया था।

इसलिए भगवान विष्णु ने माँ महाकाली की स्तुति की। तब देवी माँ ने प्रसन्न होकर भगवान विष्णु को दोनों असुरों के अंत का वर दिया। देवी माँ की माया के प्रभाव से समोहित होकर दोनों असुर भ्रमित हो गयें। वे दोनों भ्रमित असुर भगवान विष्णु से कहते है, कि युद्ध से प्रसन्न होकर हम आपको वर देना चाहते हैं। इसलिए आप हमसे अपनी इच्छानुसार वर माँग सकते हैं।

तब भगवान विष्णु उनसे कहते हैं, कि यदि तुम लोग मुझसे प्रसन्न हो तो मुझे यह वरदान दो कि तुम्हारी मृत्यु मेरे द्वारा हो जाये। माँ महाकाली की माया से भ्रमित वे दोनों असुर भगवान विष्णु को यह वरदान दे देते हैं, की आपके द्वारा हमारी मृत्यु होगी। तत्प्रश्चात, भगवान् विष्णु दोनों असुरों के मस्तक को सुदर्शन चक्र से काट देतें हैं।

उनकी मृत्यु के प्रश्चात माँ महाकाली विश्राम के लिए हिमालय चली जाती है। कुछ समय के बाद,पाताल से दो असुर भाइयों शुंभ-निशुंभ का आगमन होता है। जो पृथ्वी पर अपना अधिपत्ये हेतु देवी माँ आदिशक्ति को युद्ध की चुनौती देतें है। वे माता से युद्ध करने हेतु असुर रक्तबीज को भेजते हैं।

असुर रक्तबीज को ब्रहमा जी से यह वरदान प्राप्त था की उसके रक्त की बूंद जहां भी जितनी भी गिरेगी वहाँ उतने ही असुर रक्तबीज उत्पन्न हो जाएगें। वरदान के फलस्वरूप, माँ आदिशक्ति जब भी रक्तबीज पर प्रहार करती थी। तब उसी समय रक्तबीज के घाव से रक्त की धरा के बूंद-बूंद से अनेक रक्तबीज उत्पन्न हो जाते थे। यह देखकर माँ आदिशक्ति, माँ महाकाली के रूप में वहाँ अवतरित हुई। माँ महाकाली ने वहाँ अपने समान असंख्य देवियों को प्रकट किया।

तत्पश्चात, माँ महाकाली ने उन्हें आदेश दिया कि इन असुरो के रक्त की एक भी बूंदों को पृथ्वी पर गिरने मत देना। सारे रक्त को खप्पर में भरकर पी जाओ। माँ महाकाली और अन्य देवियाँ असुरों का रक्त धरती पर गिरने से पहले ही उसे पी जाती थी। इस प्रकार माँ महाकाली ने रक्तबीज का वध किया। उसके पश्चात, दोनों असुर भाई शुंभ और निशुंभ माता से युद्ध करने के लिए आये। माँ ने दोनों असुर भाईयों का वध कर पृथ्वी को उनके भार से मुक्त किया।

और देवताओं को उनके आतंक से मुक्ति प्रदान की। माँ महाकाली के अनेक रुप हैं। इन्हें श्यामा ,दक्षिणा कालिका (दक्षिण काली), गुह्म काली, कालरात्री, भद्रकाली, महाकाली, श्मसान काली, चामुंडा आदि नामों से संबोधित किया जाता है।

Maa Kali Vrat Katha In Hindi (माँ काली व्रत कथा) 2

कालिकापुराण में कथा आती है कि एक बार हिमालय पर अवस्थित मतंग मुनि के आश्रम में जाकर देवताओं ने महामाया स्तुति की। स्तुति से प्रसन्न होकर मतंग वनिता के रूप में भगवती ने शरीर से काले पहाड़ के समान वर्णवाली एक और दिव्य नारी को प्रकट किआ।

उस महातेजस्विनी ने स्वयं ही देवताओं की ओर से उत्तर दिया कि ‘ये लोग मेरा ही स्तवन कर रहे हैं।’ वे काजल के समान कृष्णा थीं ,इसीलिये उनका नाम काली पड़ा।

दुर्गासप्तशती के अनुसार एक बार शुम्भ—निशुम्भ के अत्याचार से व्यथित होकर देवताओं ने हिमालय पर जाकर देवी सूक्त से देवी की स्तुति की, तब देह से कौशिकी का प्राकट्य हुआ। कौशिकी के अलग होते ही पार्वती का स्वरूप कृष्ण हो गया जो काली नाम से विख्यात हुईं।

मांकाली को नीलरूपा होने के कारण तारा भी कहते हैं। नारद पांचरात्र के अनुसार एक बार काली के मन में आया कि वे पुन: गौरी हो जाएं। यह सोचकर वे अंतर्ध्यान हो गईं।

शिवजी ने नारद जी से उनका पता पूछा। नारदजी ने उनसे सुमेरू के उत्तर में देवी के प्रत्यक्ष उपस्थित होने की बात कही। शिवजी की प्रेरणा से नारद जी वहां गए। उन्होंने देवी से शिवजी के साथ विवाह का प्रस्ताव रखा।

प्रस्ताव सुनकर देवी क्रुद्ध हो गईं और उनकी देह से एक षोडशी विग्रह प्रकट हुई और उससे छाया विग्रह त्रिपुर भैरवी का प्राकट्य हुआ।

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