जया एकादशी (Jaya Ekadashi) के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी


जया एकादशी (Jaya Ekadashi) के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी

जया एकादशी (Jaya Ekadashi) हिन्दू धर्म में एक महत्त्वपूर्ण दिन है। पूरे वर्ष में 24 एकादशी के दिन आते हैं और सभी दिन अपना एक ख़ास महत्त्व रखते हैं। परन्तु मलमास या अधिमास के समय कुल एकादशी 26 हो जाती हैं।

मलमास का मतलब वर्ष में एक अधिक मास जोड़ने से है। दरअसल, हिन्दू पंचांग के अनुसार सौर और चंद्र वर्ष में सामंजस्य स्थापित करने के लिए प्रत्येक तीसरे वर्ष में एक चंद्र माह को जोड़ा जाता है।

इस मलमास के वर्ष में जुड़ने की वजह से पूरे वर्ष में कुल एकादशी 26 हो जाती हैं। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार एक माह में दो पक्ष होते हैं जिन्हें शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष कहते हैं।

हर एक पक्ष के ग्यारहवें दिन को एकादशी के रूप में मनाया जाता है। हिन्दू धर्म में मानने वाले लोग एकादशी के दिन भगवान श्री विष्णु की पूजा अर्चना करते हैं और एकादशी के व्रत रखते हैं।

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जया एकादशी व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha)

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जया एकादशी (Jaya Ekadashi) माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन मनाई जाती है। इस लेख में हम जया एकादशी के बारे में जानेंगे और साथ ही जानेंगे जया एकादशी से जुड़े अन्य तथ्यों के बारे में।

जया एकादशी क्या है? (What Is Jaya Ekadashi?)

जया एकादशी (Jaya Ekadashi) का दिन हिन्दू धर्म में अति महत्त्वपूर्ण है और माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन मनाया जाता है। जया एकादशी का दिन भगवान श्री विष्णु के लिए समर्पित है।

माघ माह में दो एकादशी आती हैं और पूरे वर्ष में 24 एकादशी होती हैं। जिस वर्ष में मलमास का योग होता है उस वर्ष में कुल 26 एकादशी होती हैं।

जया एकादशी (Jaya Ekadashi) का दिन बहुत ही पुण्यदायी होता है। जो भी मनुष्य इस दिन व्रत रखता है और विष्णु भगवान जी की पूजा करता है उसे अत्यंत पुण्य प्राप्त होता है।

जया एकादशी (Jaya Ekadashi) के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी

जया एकादशी (Jaya Ekadashi) के दिन के साथ एक महत्त्वपूर्ण कथा जुड़ी हुई है। मान्यताओं के अनुसार एक बार धर्मराज युधिष्ठिर भगवान श्री कृष्ण जी से पूछते हैं कि हे श्री कृष्ण! जया एकादशी का क्या महत्त्व है और इस विशेष दिन को किसकी पूजा की जानी चाहिए?

इस पर भगवान श्री कृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर को बताते हैं कि जया एकादशी का दिन बहुत ही पवित्र दिन है। जो व्यक्ति इस जया एकादशी का व्रत रखता है उसे भूत, प्रेत और पिशाच जैसी निम्न कोटि की योनियों से मुक्ति प्राप्त होती है।

इसके बाद श्री कृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर को एक कथा सुनाते हैं। कथा इस प्रकार है कि एक बार देवराज इंद्र की सभा में उत्सव मनाया जा रहा था। इस उत्सव सभा में गंधर्वों का गायन चल रहा था और गंधर्व कन्याओं का नृत्य हो रहा था।

इस बिच माल्यवान नामक गन्धर्व का गायन शुरू हुआ और साथ में पुष्पवती नामक गन्धर्व कन्या का नृत्य शुरू हुआ। जैसे ही पुष्पवती की नज़र माल्यवान पर पड़ती है तो पुष्पवती माल्यवान की ओर आकर्षित हो जाती है।

इस वजह से पुष्पवती सभा की मर्यादा को भूलकर माल्यवान को आकर्षित करने के लिए नृत्य करने लगती है। पुष्पवती के इस प्रकार नृत्य करने से माल्यवान पुष्पवती की ओर आकर्षित हो जाता है और इसी कारण से वह सुर-ताल से भटक जाता है।

यह देख कर देवराज इंद्र माल्यवान और पुष्पवती को सभा की मर्यादा भंग करने के लिए श्राप दे देते हैं। देवराज इंद्र दोनों को स्वर्ग से वंचित होकर मृत्यु लोक (पृथ्वी) में पिशाच योनि में जीवन व्यतीत करने का श्राप देते हैं।

जब दोनों पृथ्वी लोक में पिशाच योनि में जन्म लेते हैं तो वे दोनों हिमालय पर्वत पर एक वृक्ष के ऊपर रहना शुरू करते हैं। दोनों का जीवन पिशाच योनि में अत्यंत कष्टदायी था। दोनों इस बात से बहुत दुखी थे और दुःख में ही जीवन व्यतीत कर रहे थे।

ऐसे ही समय बीतता गया और एक दिन माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का दिन आया। अपनी ऐसी दयनीय स्थिति से दुखी होकर दोनों इस दिन फलाहार ही करते हैं।

रात्रि के समय कड़ाके की ठण्ड पड़ती है और इस वजह से दोनों पूरी रात जगे रहते हैं। सुबह तक ठण्ड में ठिठुरने की वजह से दोनों की मृत्यु हो जाती है।

इस कारण अनजाने में दोनों का जया एकादशी (Jaya Ekadashi) का व्रत पूर्ण हो जाता है और दोनों की पिशाच योनि से मुक्ति हो जाती है। इसके बाद दोनों फिर से स्वर्ग में वास करने लगते हैं।

दोनों को स्वर्ग में देख कर देवराज इंद्र ने हैरान होकर दोनों से पिशाच योनि से मुक्ति मिलने का कारण पूछा। इस पर दोनों ने साड़ी बात इंद्रदेव को बताई और कहा कि यह कृपा भगवान श्री विष्णु जी की भक्ति और जया एकादशी का प्रभाव है। यह बात सुन कर देवराज इंद्र बहुत प्रसन्न हुए और दोनों को स्वर्गलोक में ख़ुशी-ख़ुशी रहने का आशीर्वाद दिया।

इस कथा से यह ज्ञान मिलता है कि जया एकादशी (Jaya Ekadashi) का व्रत रखने से आपका जीवन अत्यंत पुण्यवान हो जाता है।

जया एकादशी किस दिन है? (On which day is Jaya Ekadashi?)

अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार जया एकादशी (Jaya Ekadashi) इस वर्ष 12 फरवरी, 2022 के दिन है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार जया एकादशी (Jaya Ekadashi) का दिन माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन मनाया जाएगा।

हिन्दू धर्म को मानने वाले लोग जया एकादशी के दिन भगवान श्री विष्णु जी के लिए समर्पित व्रत रखते है और उनकी पूजा करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन जो व्यक्ति व्रत रखता है उसे अति पुण्य प्राप्त होता है और नीच योनि में जन्म न होने से मुक्ति मिलती है।

जया एकादशी का धार्मिक महत्त्व क्या है? (What is the religious significance of Jaya Ekadashi?)

हिन्दू धर्म में जया एकादशी (Jaya Ekadashi) का एक वर्ष में होने वाली सभी एकादशियों के समान धार्मिक महत्त्व है। जया एकादशी के दिन हिन्दू धर्म में सबसे मुख्य देवों में से एक भगवान श्री विष्णु जी की पूजा की जाती है।

भगवान श्री विष्णु जी को सृष्टि का संरक्षणकर्ता भी कहा जाता है और हिन्दू धर्म में उनकी मुख्य इष्ट देव के रूप में पूजा की जाती है। वैष्णव संप्रदाय के लोग भगवान विष्णु के परम भक्त माने जाते हैं।

जया एकादशी (Jaya Ekadashi) का दिन पूरे भारत वर्ष में भगवान श्री विष्णु जी की पूजा कर के मनाया जाता है। इस दिन बहुत से लोग व्रत का भी पालन करते है जिसे वे बहुत पुण्यदायी मानते हैं।

निष्कर्ष

तो इस लेख में हमने जया एकादशी (Jaya Ekadashi) के बारे में जाना और साथ ही जया एकादशी से जुड़े अन्य तथ्यों के बारे में जानकारी प्राप्त ​की। हम आशा करते हैं कि आपको यह लेख अच्छा लगा होगा और आपके ज्ञान में इससे वृद्धि हुई होगी। कृपया इस लेख को दूसरों के साथ भी सांझा करें।

खुश रहे, स्वस्थ रह…

जय श्री कृष्ण!

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