भीष्म अष्टमी (Bhishma Ashtami) के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी


भीष्म अष्टमी (Bhishma Ashtami) के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी

भीष्म अष्टमी (Bhishma Ashtami) का दिन गंगा पुत्र भीष्म की याद में मनाया जाता है। भीष्म महाभारत काल के समय के महाप्रतापी योद्धाओं में से एक थे। उन्होंने हस्तिनापुर की रक्षा एवं संरक्षण के लिए अपना सारा जीवन न्योछावर कर दिया था।

भीष्म पांडवों और कौरवों के पितामह थे जिन्होंने महाभारत का युद्ध मजबूरी वश कौरवों के पक्ष से लड़ा था। मज़बूरी वश इसलिए क्यूंकि उन्होंने हस्तिनापुर की आजीवन सुरक्षा का वचन दे रखा था और साथ ही धृतराष्ट्र को उन्होंने यह वचन दिया था कि वो हमेशा धृतराष्ट्र और उनके बेटों के पक्ष में ही खड़े रहेंगे।

अगर आप जानना चाहते हैं कि भगवान विष्णु ने महाभारत का युद्ध क्यों करवाया था तो निचे दिए गए लिंक पर क्लिक कीजिए। इस विषय पर लेख विस्तार से लिखा गया है।

विष्णु भगवान ने महाभारत का युद्ध क्यों करवाया?

तो इस लेख में हम भीष्म अष्टमी (Bhishma Ashtami) के बारे में जानेंगे और साथ ही जानेंगे भीष्म अष्टमी से जुड़े अन्य तथ्यों के बारे में।

भीष्म अष्टमी क्या है? (What Is Bhishma Ashtami?)

हिन्दू धर्म में भीष्म अष्टमी (Bhishma Ashtami) का दिन महाभारत काल के महापराक्रमी योद्धा गंगा पुत्र भीष्म के लिए समर्पित है। भीष्म पितामह ने इसी दिन अपने शरीर का त्याग किया था।

पश्चिम बंगाल और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में भीष्म अष्टमी का दिन भीष्म पितामह के शरीर त्याग के दिन के लिए याद किया जाता है। कुछ हिस्सों पर इस दिन अवकाश भी मनाया जाता है।

भीष्म राजा शांतनु के पुत्र थे और उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था। इच्छामृत्यु के वरदान का मतलब यह था कि वह अपनी इच्छा से अपने शरीर को त्याग सकते थे।

भीष्म पितामह ने यह शपथ ले रखी थी कि वह आजीवन ब्रह्मचारी रहेंगे यानी कि वह जीवन में कभी भी विवाह नहीं करेंगे और हमेशा हस्तिनापुर कि सुरक्षा करते रहेंगे।

भीष्म अष्टमी (Bhishma Ashtami) के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी

भीष्म अष्टमी से जुड़ी कथा क्या है? (What is a legend related to Bhishma Ashtami?)

भीष्म अष्टमी (Bhishma Ashtami) से जुड़ी पौराणिक कथा इस प्रकार है कि भीष्म पितामह को अपने पिता राजा शांतनु से इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त था। इस वरदान के अंतर्गत भीष्म अपनी इच्छा के अनुसार अपने शरीर का त्याग कर सकते थे।

अगर भीष्म अपने शरीर का त्याग नहीं करना चाहते तो वह आजीवन जीवित रह सकते थे। भीष्म ने यह शपथ ले रखी थी कि वह आजीवन विवाह नहीं करेंगे और साथ ही हस्तिनापुर की सुरक्षा के लिए सदैव खड़े रहेंगे।

बाद में जब पांडवों और कौरवों के बिच महाभारत का युद्ध हुआ तो उन्होंने मजबूरी वश हस्तिनापुर के लिए कौरवों कि तरफ से युद्ध लड़ा। अर्जुन ने भीष्म को पराजित करने के लिए शिखंडी की सहायता ली।

अर्जुन ने भीष्म पर तीरों की वर्षा कर दी और युद्ध भूमि पर अर्जुन के तीरों से छलनी होकर भीष्म गिर पड़े। वह चाहते तो खड़े हो कर फिर से लड़ सकते थे परन्तु अब उन्हें ज्ञान हो चूका था कि वह अधर्म के पक्ष से लड़ रहे हैं।

इसलिए उन्होंने इच्छा जताई कि अर्जुन उनके लिए बाणों कि शैय्या बना दे ताकि वे उस पर लेट सकें और अर्जुन ने वैसा ही किया। माना जाता है कि भीष्म पितामह ने अपना शरीर त्यागने के लिए 58 दिनों तक उत्तरायण के पहले दिन तक की प्रतीक्षा की।

जिस दिन भीष्म में शरीर का त्याग किया उस दिन को भीष्म अष्टमी (Bhishma Ashtami) के नाम से जाना जाता है।

भीष्म अष्टमी किस दिन है? (On which day is Bhishma Ashtami?)

अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार भीष्म अष्टमी (Bhishma Ashtami) इस वर्ष 8 फरवरी 2022 के दिन है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार भीष्म अष्टमी (Bhishma Ashtami) माघ माह की शुक्ल अष्टमी के दिन है।

भीष्म अष्टमी के दिन को महाभारत के महापराक्रमी योद्धा भीष्म पितामह के शरीर त्याग के दिन के रूप में मनाया जाता है।

भीष्म अष्टमी का धार्मिक महत्त्व क्या है? (What is the religious significance of Bhishma Ashtami?)

भीष्म अष्टमी (Bhishma Ashtami) का हिन्दू धर्म में महान धार्मिक महत्त्व है। जैसा कि हमने इस लेख में जाना कि भीष्म अष्टमी का दिन भीष्म पितामह से जुड़ा हुआ है।

भीष्म पितामह ने अपने सम्पूर्ण जीवन को हस्तिनापुर के विकास एवं सुरक्षा के लिए लगा दिया था और उन्होंने आजीवन ब्रह्मचारी रहने की शपथ भी ली थी।

इस से हमें यह सीखने को मिलता है कि हमें भी अपने राष्ट्र की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए परन्तु धर्म का ज्ञान होना भी आवश्यक है। क्यूंकि भीष्म पितामह हमेशा खड़े तो हस्तिनापुर के लिए रहे परन्तु अंत में उन्होंने न चाहते हुए भी मजबूरी वश अधर्म का साथ दे दिया।

तो भीष्म पितामह के जीवन से हमें यह सीख ज़रूर लेनी चाहिए और भीष्म अष्टमी (Bhishma Ashtami) का दिन मनाना चाहिए।

भीष्म अष्टमी पूजा किस प्रकार की जाती है? (How to perform Bhishma Ashtami Puja?)

हिन्दू धर्म को मानाने वाले लोग भीष्म पितामह के सम्मान में भीष्म अष्टमी (Bhishma Ashtami) के दिन “एकोदिष्ट श्राद्ध” के अनुष्ठान का पालन करते हैं।

मान्यता यह है कि केवल वे भक्त ही इस अनुष्ठान का पालन कर सकते हैं जिनके पिता अब जीवित नहीं हैं। परन्तु कुछ समुदाय के लोग इस मान्यता को नहीं मानते और यह मानते हैं कि कोई भी भीष्म अष्टमी पूजा (Bhishma Ashtami Puja) कर सकता है।

भीष्म पितामह की आत्मा को शांति देने के लिए लोग पास की नदी के तट पर जाकर तर्पण की धार्मिक क्रिया करते हैं। इसके साथ ही वे अपने पूर्वजों का सम्मान भी करते हैं।

कई लोग गंगा नदी में पवित्र डुबकी लगाकर जीवन और मृत्यु के चक्र से बाहर आने और अपनी आत्मा को शुद्ध करने के लिए प्रार्थना करते हैं। इस दिन लोग उबले हुए चावल और तिल चढ़ाते हैं।

कुछ भक्त दिन में उपवास रखते हैं और अर्घ्य देते हैं। भीष्म पितामह का आशीर्वाद पाने के लिए भक्त “भीष्म अष्टमी मंत्र” का जाप भी करते हैं।

निष्कर्ष

तो इस लेख में हमने भीष्म अष्टमी (Bhishma Ashtami) के बारे में जाना और साथ ही भीष्म अष्टमी से जुड़े अन्य तथ्यों के बारे में जानकारी प्राप्त ​की। हम आशा करते हैं कि आपको यह लेख अच्छा लगा होगा और आपके ज्ञान में इससे वृद्धि हुई होगी। कृपया इस लेख को दूसरों के साथ भी सांझा करें।

खुश रहे, स्वस्थ रह…

जय श्री कृष्ण!

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