भगवान शिव और माता सती का विवाह


भगवान शिव और माता सती का विवाह

आज इस लेख में हम बात करेंगे “देवों के देव” भगवान शिव और माता सती के बारे में। माता सती “आदि शक्ति” का ही एक रूप हैं। भगवान शिव परम तत्व हैं तो आदि शक्ति इस परम तत्व का एक अभिन्न अंग हैं। आदि शक्ति परम तत्व की परम शक्ति हैं। एक दुसरे के बिना यह सृष्टि न तो जन्म ले सकती है और न ही जीवित रह सकती है।

इस लेख में हम जानेंगे कि भगवान शिव और माता सती का विवाह कौन से युग में हुआ? साथ ही हम जानेंगे कि इस विवाह के परिणाम क्या रहे।

भगवान शिव और माता सती का विवाह कौन से युग में हुआ?

भगवान शिव और माता सती का विवाह “सत्य युग” में हुआ था। यह विवाह भी भगवान शिव और माता आदि शक्ति की लीला का एक हिस्सा था जिस से आने वाली मानव पीढ़ीओं को शिक्षा मिली।

भगवान शिव और माता सती के विवाह की कथा

बात तब की है जब ब्रह्मा भगवान के एक पुत्र हुआ करते थे जिनका नाम था “दक्ष”। उन्हें प्रजापति दक्ष के नाम से भी जाना जाता है। प्रजापति का अर्थ है “प्रजा का राजा”। जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की संरचना की तो ब्रह्मा जी के पुत्रों ने प्रजापति बनने से मना कर दिया केवल दक्ष ने ही प्रजापति बनने का प्रस्ताव स्वीकार किया।

इस प्रकार दक्ष को प्रजा का राजा चुना गया और उनको इसका कार्यभार दिया गया। प्रजापति दक्ष का विवाह “स्वयंभू मनु” की पुत्री “प्रसूति” से हुआ और इन दोनों की 16 पुत्रियां हुईं। 16 में से एक पुत्री का नाम “सती” था। सती माता आदि शक्ति का ही एक रूप थीं। प्रजापति दक्ष को माँ आदि शक्ति के रूप में सती की प्राप्ति घोर तप के बाद हुई थी।

ब्रह्मा जी ने प्रजापति दक्ष को आदेश दिया की अपनी पुत्री सती का विवाह देवों के देव भगवान शिव से कर दो। यह आज्ञा प्राप्त कर के प्रजापति दक्ष ने अपनी पुत्री सती का विवाह भगवान शिव से करवा दिया।

लेकिन यह विवाह होना इतना सरल नहीं था। माता सती ने इस जन्म में भगवान शिव की प्राप्ति के लिए घोर तप किया था। तब जा के भगवान शिव और माता सती का विवाह हुआ था।

प्रजापति दक्ष का भगवान शिव से बैर

एक बार प्रजापति दक्ष ने एक महासभा का आयोजन किया। इस महासभा में उन्होंने सभी देवी देवताओं को आमंत्रित किया। सभी देवगणऔर देवियाँ वहां पर उपस्थित थे तभी प्रजापति दक्ष वहां पर आये। उनके सम्मान में सभी देवी देवता खड़े हो गए परंतु ब्रह्मा, विष्णु और भगवान शिव खड़े नहीं हुए।

प्रजापति दक्ष को ब्रह्मा और विष्णु भगवान के सम्मान में खड़ा न होने पर इतना दुःख नहीं हुआ जितना क्रोध उन्हें भगवान शिव के सम्मान में न खड़े होने पर हुआ।

भगवान ब्रह्मा ठहरे दक्ष के पिता और भगवान विष्णु को दक्ष अपना आराध्य देव मानते थे। लेकिन भगवान शिव तो उनके दामाग थे तो यह बात उनको अच्छी नहीं लगी।

उन्होंने इसे अपमान के रूप में लिया और मन ही मन यह प्रतिज्ञा ले ली कि भगवान शिव से इस अपमान का बदला ज़रूर लेंगे। भगवान शिव ने यह लीला प्रजापति दक्ष का अपमान करने के लिए नहीं की थी बल्कि वह तो उनका अहंकार मिटाना चाहते थे।

बस यही कारण था कि दक्ष भगवान शिव से बैर रखने लगे और शिव जी से अपने अपमान का बदला लेने के लिए एक उचित समय की प्रतीक्षा करने लगे।

भगवान शिव का अपमान और सती माँ का अपने शरीर का त्याग

एक दिन प्रजापति दक्ष ने महायज्ञ की घोषणा की और इसी दिन को उन्होंने भगवान शिव से अपने अपमान का बदला लेने के लिए सोचा। प्रजापति दक्ष ने सभी देवी देवताओं को इस यज्ञ में आमंत्रित किया परंतु भगवान शिव को उन्होंने आमंत्रित नहीं किया।

जब सभी देवी देवता यज्ञ में उपस्थित होने के लिए प्रस्थान कर रहे थे तो देवी सती ने उन्हें देखा और भगवान शिव से कहा कि स्वामी यह देवगण इस समय कहाँ जा रहे हैं। इस पर भगवान शिव ने उत्तर देते हुए देवी सती को बताया कि उनके पिता ने एक महायज्ञ का आयोजन किया है। यह सभी वहीं पर जा रहे हैं।

यह जान कर माता सती विचलित हो उठीं और सोचने लगी कि उनके पिता ने उनके पति को इस महायज्ञ में क्यों आमंत्रित नहीं किया। माता भगवान शिव से वहां चलने का हठ करने लगीं।

इस पर भगवान शिव ने कहा कि देवी हमें उन्होंने आमंत्रित नहीं किया है इसलिए हमारा वहां जाना उचित नहीं होगा परंतु माता सती और व्याकुल होकर के हठ करने लगीं। भगवान शिव ने माता सती से कहा कि वह इस महायज्ञ में नहीं जा सकते और माता को भी न जाने की सलाह दी।

अंत में जब माता नहीं मानी तो भगवान शिव ने माता सती को यज्ञ में जाने की आज्ञा दी। इसके बाद माता सती ने अपने पिता के घर महायज्ञ के लिए प्रस्थान किया।

माता सती जब यज्ञ में पहुंची तो सभी देवगणों को वहां पर देख कर चौंक गयीं और अपने पिता से प्रश्न किया कि उन्होंने भगवान शिव को इस यज्ञ में आमंत्रित क्यों नहीं किया?

इस पर प्रजापति दक्ष ने क्रोधित होकर कहा – “अपनी सभी बहनों को देखो कैसे सुस्सजित होकर आयी हुई हैं परंतु तुम खुद को देखो क्या हाल बना कर रखा है। तुम्हारा पति तुम्हे कुछ भी देने के काबिल नहीं है। वह तो बस वन में रहता है। हमेशा भस्म अपने शरीर पर लगा कर रहता है। इसलिए मैंने उसे यहाँ पर आमंत्रित नहीं किया। मैं अपनी सभा को उसको आमंत्रित कर के अपमानित नहीं कर सकता।”

यह सुन कर माता सती क्रोधित हो गयीं और अपने सामने अपने पति का अपमान सहन नहीं कर पायीं। क्रोधित होकर माता सती ने महायज्ञ की अग्नि में अपने देह का त्याग कर के उसकी आहुति दे दी।

जब यह बात भगवान शिव को पता चली तो वह क्रोधित हो गए और उन्होंने अपनी जटाओं से अपने ही एक महा विध्वंसकारी रूप को प्रकट किया। यह भगवान शिव का “वीरभद्र” अवतार था।

भगवान शिव और माता सती का विवाह
“वीरभद्र” अवतार

वीरभद्र भगवान शिव का महा विध्वंसकारी और डराने वाला रूप है। भगवान शिव कि आज्ञा से वीरभद्र प्रजापति दक्ष का विनाश करने के लिए उनकी ओर बढ़ा। प्रजापति दक्ष ने अपनी जान बचाने के लिए अपने आराध्य देव भगवान विष्णु से प्रार्थना की परन्तु भगवान शिव के क्रोध के आगे भगवान विष्णु भी दक्ष की रक्षा न कर सके।

अंत में वीरभद्र ने प्रजापति दक्ष का सर काट के उसी यज्ञ कुंड में जला डाला और माता सती के शरीर को भगवान शिव के पास लाया।

माता के शक्तिपीठों की कथा

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार माता सती के मृत शरीर को देख कर भगवान शिव इतने बेसुध हो गए कि उनका शरीर उठा कर वर्षों तक सृष्टि का भ्रमण करते रहे। इस वजह से साड़ी सृष्टि असंतुलित हो गयी।

अंत में देवगण भगवान विष्णु की शरण में गए और उनसे सब कुछ फिर से ठीक करने की प्रार्थना की। इस पर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के 51 टुकड़े किये। माता के शरीर के यह हिस्से धरती पर जिस जिस जगह पर गिरे उनको आज शक्तिपीठों के रूप में जाना जाता है और हिन्दू धर्म में माता के इन शक्तिपीठों का अहम् स्थान है।

कई ग्रंथों में शक्तिपीठों की संख्या अलग अलग बताई जाती है परंतु मुख्य रूप से माता के 51 शक्तिपीठ माने गए हैं।

निष्कर्ष

तो इस लेख में हमने भगवान शिव और माता सती के विवाह की कथा को जाना और साथ ही यह जाना कि भगवान शिव और माता सती का विवाह कौन से युग में हुआ? यह सब ईश्वर कि लीलाएं होती हैं इस सृष्टि का सञ्चालन करने के लिए और यहाँ पर रहने वाले जीवों को शिक्षा प्रदान करने के लिए।

आशा करता हूँ आपको यह लेख अच्छा लगा होगा। कृप्या इस लेख को दूसरों के साथ भी साँझा कीजिएगा।

स्वस्थ रहिये, खुश रहिये…

जय श्री कृष्ण!

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