Baglamukhi Chalisa In Hindi (बगलामुखी चालीसा) Lyrics


Baglamukhi Chalisa In Hindi (बगलामुखी चालीसा) Lyrics

देवी बगलामुखी महत्वपूर्ण महाविद्याओं (महान ज्ञान / विज्ञान) में से एक हैं। देवी बगलामुखी भक्त की भ्रांतियों और भ्रमों (या भक्त के शत्रुओं) को नष्ट करती हैं।

“बगला” शब्द “वल्गा” (जिसका अर्थ है – लगाम या लगाम लगाना) शब्द से लिया गया है, जो “वागला” और फिर “बगला” बन गया। देवी के 108 अलग-अलग नाम हैं। बगलामुखी को आमतौर पर उत्तर भारत में पीतांबरी मां के रूप में जाना जाता है, जो पीले रंग या सुनहरे रंग से जुड़ी देवी है।

वह एक स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान है जिसमें विभिन्न रत्नों से अलंकृत स्तंभ हैं और उसकी तीन आंखें हैं, जो इस बात का प्रतीक है कि वह भक्त को परम ज्ञान प्रदान कर सकती है।

Benefits of Baglamukhi Chalisa (बगलामुखी चालीसा के लाभ)

माना जाता है कि बंगलामुखी चालीसा में चमत्कारी शक्तियां होती हैं और इसका पाठ करने से दुश्मनों पर जीत सुनिश्चित होती है। यदि किसी व्यक्ति या अन्य ताकतों के कारण किसी को अपने जीवन में किसी भी समस्या का सामना करना पड़ रहा है तो निश्चित रूप से राहत के लिए इस चालीसा का उपयोग कर सकते हैं।

Baglamukhi Chalisa In Hindi (बगलामुखी चालीसा) Lyrics

इस दुनिया में आध्यात्मिक ज्ञान और आदर्श जीवन के मार्ग में आने वाली बाधाओं को इस प्रकार रेखांकित किया गया है। धर्मी जीवन के पाँच आंतरिक शत्रु हैं, अर्थात् काम (वासना), क्रोध (क्रोध), लोभ (लोभ या लालच), मोह (भौतिकवाद, सांसारिक संबंधों से लगाव) अहंकार (अभिमान)। सभी बुराइयों का मूल कारण हुमाई (अहंकार) है।

यदि आपका लक्ष्य आत्म-साक्षात्कार या मोक्ष है तो आपको माँ बगलामुखी की साधना करनी चाहिए क्योंकि वह उपरोक्त सभी शत्रुओं को नष्ट करने के लिए प्रसिद्ध हैं। इसलिए सभी को जन्म के चक्र को दूर करने के लिए मां बगलामुखी की साधना करनी चाहिए। तो आत्म-साक्षात्कार या मोक्ष इस पवित्र साधना का आध्यात्मिक लाभ है। भगवान कृष्ण और अर्जुन ने भी इसी कारण से मां बगलामुखी की पूजा की।

Baglamukhi Chalisa Doha (बगलामुखी चालीसा दोहा)

सिर नवाइ बगलामुखी,
लिखूं चालीसा आज ॥

कृपा करहु मोपर सदा,
पूरन हो मम काज ॥

Baglamukhi Chalisa Chaupai (बगलामुखी चालीसा चौपाई)

जय जय जय श्री बगला माता ।
आदिशक्ति सब जग की त्राता ॥

बगला सम तब आनन माता ।
एहि ते भयउ नाम विख्याता ॥

शशि ललाट कुण्डल छवि न्यारी ।
असतुति करहिं देव नर-नारी ॥

पीतवसन तन पर तव राजै ।
हाथहिं मुद्गर गदा विराजै ॥ 4 ॥

तीन नयन गल चम्पक माला ।
अमित तेज प्रकटत है भाला ॥

रत्न-जटित सिंहासन सोहै ।
शोभा निरखि सकल जन मोहै ॥

आसन पीतवर्ण महारानी ।
भक्तन की तुम हो वरदानी ॥

पीताभूषण पीतहिं चन्दन ।
सुर नर नाग करत सब वन्दन ॥ 8 ॥

एहि विधि ध्यान हृदय में राखै ।
वेद पुराण संत अस भाखै ॥

अब पूजा विधि करौं प्रकाशा ।
जाके किये होत दुख-नाशा ॥

प्रथमहिं पीत ध्वजा फहरावै ।
पीतवसन देवी पहिरावै ॥

कुंकुम अक्षत मोदक बेसन ।
अबिर गुलाल सुपारी चन्दन ॥ 12 ॥

माल्य हरिद्रा अरु फल पाना ।
सबहिं चढ़इ धरै उर ध्याना ॥

धूप दीप कर्पूर की बाती ।
प्रेम-सहित तब करै आरती ॥

अस्तुति करै हाथ दोउ जोरे ।
पुरवहु मातु मनोरथ मोरे ॥

मातु भगति तब सब सुख खानी ।
करहुं कृपा मोपर जनजानी ॥ 16 ॥

त्रिविध ताप सब दुख नशावहु ।
तिमिर मिटाकर ज्ञान बढ़ावहु ॥

बार-बार मैं बिनवहुं तोहीं ।
अविरल भगति ज्ञान दो मोहीं ॥

पूजनांत में हवन करावै ।
सा नर मनवांछित फल पावै ॥

सर्षप होम करै जो कोई ।
ताके वश सचराचर होई ॥ 20 ॥

तिल तण्डुल संग क्षीर मिरावै ।
भक्ति प्रेम से हवन करावै ॥

दुख दरिद्र व्यापै नहिं सोई ।
निश्चय सुख-सम्पत्ति सब होई ॥

फूल अशोक हवन जो करई ।
ताके गृह सुख-सम्पत्ति भरई ॥

फल सेमर का होम करीजै ।
निश्चय वाको रिपु सब छीजै ॥ 24 ॥

गुग्गुल घृत होमै जो कोई ।
तेहि के वश में राजा होई ॥

गुग्गुल तिल संग होम करावै ।
ताको सकल बंध कट जावै ॥

बीलाक्षर का पाठ जो करहीं ।
बीज मंत्र तुम्हरो उच्चरहीं ॥

एक मास निशि जो कर जापा ।
तेहि कर मिटत सकल संतापा ॥ 28 ॥

घर की शुद्ध भूमि जहं होई ।
साध्का जाप करै तहं सोई ॥

सेइ इच्छित फल निश्चय पावै ।
यामै नहिं कदु संशय लावै ॥

अथवा तीर नदी के जाई ।
साधक जाप करै मन लाई ॥

दस सहस्र जप करै जो कोई ।
सक काज तेहि कर सिधि होई ॥ 32 ॥

जाप करै जो लक्षहिं बारा ।
ताकर होय सुयशविस्तारा ॥

जो तव नाम जपै मन लाई ।
अल्पकाल महं रिपुहिं नसाई ॥

सप्तरात्रि जो पापहिं नामा ।
वाको पूरन हो सब कामा ॥

नव दिन जाप करे जो कोई ।
व्याधि रहित ताकर तन होई ॥ 36 ॥

ध्यान करै जो बन्ध्या नारी ।
पावै पुत्रादिक फल चारी ॥

प्रातः सायं अरु मध्याना ।
धरे ध्यान होवैकल्याना ॥

कहं लगि महिमा कहौं तिहारी ।
नाम सदा शुभ मंगलकारी ॥

पाठ करै जो नित्या चालीसा ।
तेहि पर कृपा करहिं गौरीशा ॥ 40 ॥

Final Baglamukhi Chalisa Doha (अंतिम बगलामुखी चालीसा दोहा)

सन्तशरण को तनय हूं,
कुलपति मिश्र सुनाम ।

हरिद्वार मण्डल बसूं ,
धाम हरिपुर ग्राम ॥

उन्नीस सौ पिचानबे सन् की,
श्रावण शुक्ला मास ।

चालीसा रचना कियौ,
तव चरणन को दास ॥

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