आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha In Hindi)


आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha In Hindi)

आमलकी एकादशी (Amalaki Ekadashi) हिंदू धर्म में एक पवित्र दिन माना जाता है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार यह दिन फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन होता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह दिन फरवरी या मार्च के महीने में आता है।

आमलकी एकादशी के नाम से ही पता चलता है कि यह दिन आंवले के वृक्ष की पूजा करने के लिए मनाया जाता है। “आमलका” का अर्थ होता है “आंवला“। इस एकादशी के दिन आंवला वृक्ष की पूजा की जाती है।

आमलकी एकादशी व्रत (Amalaki Ekadashi Vrat) और आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha) दुराचारी और महापापी मनुष्य के लिए अत्यंत उपयोगी है।

आमलकी एकादशी (Amalaki Ekadashi) के दिन व्रत रखने से मनुष्य पर भगवान श्री विष्णु जी की कृपा होती है और वह अपने बुरे कर्मों से मुक्त होकर मृत्यु के बाद एक अच्छा जन्म प्राप्त करता है।

कई लोग आमलकी एकादशी व्रत (Amalaki Ekadashi Vrat) करके भगवान से मोक्ष की प्रार्थना करते हैं और इस दिन भगवान श्री विष्णु जी और आंवले के वृक्ष की पूजा करते हैं।

हिन्दू धर्म को मानने वाले लोग इस दिन उपवास रखते हैं और बुरे कर्मों से मुक्ति तथा अगले जन्म में अच्छे जीवन के साथ साथ मोक्ष प्राप्ति के लिए भगवान श्री विष्णु जी की पूजा करते हैं। यह दिन विशेष रूप से विष्णु जी के भक्त वैष्णव संप्रदाय के लोगों द्वारा मनाया जाता है।

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इस लेख में हम आमलकी एकादशी व्रत (Amalaki Ekadashi Vrat), आमलकी एकादशी व्रत विधि (Amalaki Ekadashi Vrat Vidhi) और आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha) के बारे में जानेंगे।

आमलकी एकादशी व्रत और आमलकी एकादशी व्रत कथा कब करनी चाहिए? (When to do Amalaki Ekadashi Vrat and Amalaki Ekadashi Vrat Katha?)

आमलकी एकादशी व्रत (Amalaki Ekadashi Vrat) और आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha) ईश्वर से सुख प्राप्ति, बुरे कर्मों से मुक्ति, अगले जन्म में अच्छे जीवन, मोक्ष प्राप्ति और आध्यात्मिक सफाई के बारे में है।

यह दिन भगवान विष्णु जी को समर्पित है। हिंदू मान्यता के अनुसार एक चंद्र चरण के दो अलग-अलग चरण होते हैं – कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। प्रत्येक चरण (पक्ष) 14 दिनों का होता है। इन दोनों पक्षों को ही हिन्दू कैलेंडर माह के पक्ष भी कहा जाता है।

दोनों पक्षों के ग्यारहवें दिन को एकादशी कहा जाता है। इसलिए एक माह में दो एकादशी के दिन आते हैं। इस दिन रखे जाने वाले व्रत या कर्मकांड को एकादशी व्रत कहा जाता है और दुनिया भर में लाखों हिंदुओं द्वारा मनाया जाता है।

फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आमलकी एकादशी कहा जाता है। इस दिन ही आमलकी एकादशी व्रत (Amalaki Ekadashi Vrat) तथा आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha) रखनी चाहिए।

आमलकी एकादशी व्रत एक दिन पहले सूर्यास्त से शुरू होकर एकादशी के अगले दिन सूर्योदय के बाद तक रखा जाता है।

आमलकी एकादशी व्रत कथा विधि (Amalaki Ekadashi Vrat Katha Vidhi In Hindi)

आमलकी एकादशी व्रत (Amalaki Ekadashi Vrat) और आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha) की पूजा विधि इस प्रकार है।

  • सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं।
  • घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें।
  • भगवान विष्णु का गंगा जल से अभिषेक करें।
  • भगवान विष्णु को पुष्प और तुलसी अर्पित करें।
  • अगर संभव हो तो इस दिन व्रत भी रखें।
  • व्रत कथा का पाठ करें। (व्रत कथा इस लेख में निचे दी गयी है। कृपया कर के व्रत कथा वहां से पढ़ें।)
  • भगवान की आरती करें। (इस लेख के अंत में एकादशी आरती के लेख का लिंक दिया गया है। उस पर क्लिक कर के आप एकादशी आरती पढ़ सकते हैं।)
  • भगवान को भोग लगाएं। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि भगवान को सिर्फ सात्विक चीजों का भोग लगाया जाता है। भगवान विष्णु के भोग में तुलसी को जरूर शामिल करें। ऐसा माना जाता है कि बिना तुलसी के भगवान विष्णु भोग ग्रहण नहीं करते हैं।
  • इस पावन दिन भगवान विष्णु के साथ ही माता लक्ष्मी की पूजा भी करें।
  • इस दिन भगवान का अधिक से अधिक ध्यान करें।
  • भगवान श्री विष्णु जी की पूजा के बाद पूजन सामग्री लेकर आंवले के वृक्ष की पूजा करें। सबसे पहले आंवले के वृक्ष के चारों ओर की भूमि को साफ करें। उस जगह को हो सके तो गंगा जल या गाय के गोबर से लेप कर पवित्र करें। पेड़ की जड़ के साथ वेदी बनाकर उस पर कलश स्थापित करें। इस कलश में देवताओं, तीर्थों एवं सागर को आमत्रित करें और फिर दीप जलाकर वहां रखें। कलश के ऊपर चंदन का लेप करें और वस्त्र पहनाएं। इसके बाद कलश के ऊपर श्री विष्णु जी के छठे अवतार परशुराम जी की मूर्ति स्थापित करें और विधिवत रूप से परशुराम जी की पूजा करें। द्वादशी के दिन प्रात: ब्राह्मण को भोजन करवाकर और दान दक्षिणा देकर परशुराम जी की मूर्ति के साथ कलश भेंट करें। राजस्थान के कई क्षेत्रों में आंवला वृक्ष न होने पर खेजड़ी वृक्ष की पुजा की जाती है।
  • अगले दिन सूर्योदय के बाद व्रत खोलें और सात्विक भोजन करें। बहुत से लोग व्रत के दौरान फलाहार ग्रहण करते हैं और कुछ लोग कुछ भी खाना ग्रहण नहीं करते। यहाँ तक की पानी भी ग्रहण नहीं करते। परन्तु आप व्रत के दौरान फलाहार ग्रहण कर सकते हैं।
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आमलकी एकादशी व्रत और आमलकी एकादशी व्रत कथा के लाभ (Benefits of Amalaki Ekadashi Vrat and Amalaki Ekadashi Vrat Katha)

आमलकी एकादशी व्रत (Amalaki Ekadashi Vrat) और आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha) का लाभ उन लोगों के लिए है जो भगवान विष्णु की आस्था और पूजा करते हैं।

इसे हिंदू धर्म में सबसे फलदायी व्रतों में से एक माना जाता है। एकादशी व्रत के लाभ आपको शांति, सद्भाव और समृद्धि ला सकते हैं। इस पवित्र हिंदू अनुष्ठान के भक्त, मन की शांति के साथ बुरे कर्मों से मुक्ति, अगले जन्म में अच्छा जीवन, मोक्ष और समृद्धि प्राप्त करते हैं।

आमलकी एकादशी व्रत (Amalaki Ekadashi Vrat) और आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha) को बुरे कर्मों से मुक्ति, अगले जन्म में अच्छा जीवन, मोक्ष प्राप्ति के लिए अति योग्य माना जाता है।

जो मनुष्य इस महत्त्वपूर्ण आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha) को पढ़ता या सुनता है उसे अंत में स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha In Hindi)

एक नगर में चैत्ररथ नाम का राजा था। वह बहुत ही विद्वान तथा धार्मिक व्यक्ति था। राजा के राज्य में कोई भी गरीब नहीं था और न ही कोई कंजूस या पापी था।

उस राज्य के सभी लोग विष्णु भगवान जी के भक्त थे यानि वैष्णव संप्रदाय से सम्बन्ध रखते थे। उस राज्य के सभी निवासी हर एक एकादशी का व्रत करते थे।

एक दिन की बात है जब फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी आई। उस दिन राजा के राज्य के सभी लोगों ने एकादशी का व्रत रखा।

राजा ने अपनी प्रजा के साथ मंदिर में आकर कलश की स्थापना की और भगवान का पूजन करने लगा। उस मंदिर में रात को राज्य के सभी लोगों ने राजा सहित जागरण किया।

रात को जागरण के समय उस जगह पर एक बहेलिया आया। वह बहेलिया महापापी तथा दुराचारी व्यक्ति था। अपने परिवार का पालन करने के लिए वह जीव हिंसा करता था।

लेकिन उस दिन उसे कोई भी जीव प्राप्त नहीं हो पाया और वह भूख-प्यास से बहुत ही व्याकुल था। उसने सोचा मंदिर में कुछ भोजन प्राप्त हो जाएगा, इसलिए वह मंदिर के एक कोने में जा कर के बैठ गया।

उसने मंदिर में बैठकर भगवान श्री विष्णु जी की आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha) तथा एकादशी का महत्त्व सुना। इस प्रकार उस बहेलिए की सारी रात जागरण और कथा सुनने में बीत गयी।

सुबह होने पर बहेलिया सभी लोगों की तरह अपने घर वापस चला गया। कुछ समय बीता और उस बहेलिए की मृत्यु हो गई। उसने जीव हिंसा की थी, इसलिए उसे नरक भोगना था।

परन्तु एकादशी के दिन भूखा होने के कारण और जागरण तथा कथा सुनने के कारण बहेलिए का आमलकी एकादशी का व्रत अनजाने में पूर्ण हो चूका था।

इसलिए व्रत के प्रभाव से उसका जन्म राजा विदुरथ के घर पर हुआ। राजा ने पुत्र का नाम वसुरथ रखा। बड़ा होने पर राजा का पुत्र वसुरथ चतुरंगिणी सेना के स्वामित्व तथा धन-धान्य से युक्त होकर 10,000 नगरों का संचालन करने लगा।

वह बहुत ही तेजस्वी राजा बना। एक दिन राजा अकेला शिकार करने जंगल की ओर गया। जंगल घना होने के कारण राजा रास्ता भटक गया और एक वृक्ष के निचे जा कर बैठ गया।

इतने में ही वहां पर जंगली डाकुओं ने आकर राजा पर हमला कर दिया। वह अपने हथियारों से राजा पर प्रहार करने लगे और राजा अपनी सुध खोकर बेहोश हो गया।

राजा के बेहोश होते ही उसके शरीर से एक दिव्य स्त्री उत्पन्न हुई। वह बहुत ही सुन्दर प्रतीत हो रही थी परन्तु उसकी आँखों में अत्यंत आक्रोश था।

उस स्त्री ने डाकुओं का एक-एक कर के संहार किया। जब राजा नींद से जागा तो उसने सभी डाकुओं को मृत पाया। राजा सोच में पड़ गया कि आखिर यह हुआ कैसे?

राजा वसुरथ ऐसा विचार कर ही रहा था कि तभी आकाश से आकाशवाणी हुई – “हे राजन! इस सृष्टि में भगवान श्री विष्णु जी के आलावा तेरी रक्षा और कौन कर सकता है?”

यह सुनकर राजा ने भगवान श्री विष्णु जी को स्मरण कर के उन्हें प्रणाम किया और अपने राज्य को वापस आ गया। इसके बाद राजा सुखपूर्वक अपने राज्य का संचालन करने लगा।

यह आमलकी एकादशी के व्रत और आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha) का प्रभाव ही था, जिस से उस बहेलिए को यह लाभ प्राप्त हुआ।

इस कथा से हमें आमलकी एकादशी व्रत (Amalaki Ekadashi Vrat) और आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha) का महत्त्व पता चलता है।

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